राग रेखता भजन raag rekhta bhajans lyrics



:: राग रेखता ::

टेरत हूं बारबार कयो मान मेरो,
काम बिना भटकत क्‍यूं फिरत ही अवेरो।
आणत घट घट मांही दियो हुता पहरो।
भूलाय कट भाज गई, ऐसो तेरो जोरो।
कर तोड़ तोसू कायणी, में करती हुं नहेरो।
अज ऐसे मान मोहरी कर जोड़।
लिखमो कहे टक श्‍याम से तुक जोड़।।1।।

देख देख रे देखिये सब लिखा खेल,
मैं मत मगरूर क्‍यूं करता हैै। 
भक्ति भेदत नहीं भर्म भूला,
फिरे जोय जोय रे जन्‍म क्‍यू खोवता है।
हाजिर हक हजूर को दूर मत जाणे देख।
जोया जूण क चूज पजोवता है,
हरि हरदम हाजर लेत है।
लिखमा जोय जाण जैसा हो ओ होवता है।।2।।

मन मान सुख आलसूं और की यार सूं,
फेर किनकी आश्‍क कीजीये जी।
यार तो यादजी हक हाजर खड़ा,
रीझ रीझ महरे नित लोरीये जी।
नाम सुणाय बिछोड़ीये जी,
ओर तो इश्‍क सब अल्‍प है।
लिखमा अलख सूं आश्‍क जोडियेजी।।3।।

हक ही हक विचार ले,
झीखर में मकर का काम कांई।
मन कूं मार ले चेतले दोय दिन मांही।
ओर की अर्ज से गर्ज कैसे सूझे,
कर फकर फरीयाद एक पिव तांही।
लिखमा बुस्‍त लाध सी,
कुछ बंदगी कियां।
केहर तज महर ले मांही।।4।।

दाता दीसे एक कूं सब ही जांचो भाई,
लख चौरासी जीव जीवों को रिजक निवाजे सांई।
जीव जैसे दे चुण अलख उदर परवाणे।
चोकस देई चितारे सवारे भूल न जाणे।
उनकी सदावर्त दिन रेण बंटत लेवे सभी कोई।
सगत मुक्ति फल देण ज्‍यां दाता हरि सोई।
तीन लोक तारे तांका दाता दाता दिसे एक।
लिखमा दाता अलख है वहारे मोद बण्‍या अनेक।।5।।

देखिया एक अलेख सब भेख में,
भूला दोय के भर्म मांही।
नाम निज तंत ज्‍यूं सत रा तार है।
नीवण ज्‍यू नीरकी सीर है आही।
चेत दिन च्‍यार की बार है बावरे।
देह को देवता देह के मांही।
कर जोड़ लिखमो कहे गेल अनेक है।
सही है सर्व बीच एक अलख सांई।।6।।

मान रे मान तू जाण जगदीश कूं,
आण इतबार देख कर्तार कांनी।
ज्ञान गेले चलो सांच संग होय विश्‍वास,
के वासी ज्‍यूं विश्‍वास जाणी।
विश्राम जब जीव कूं पिव पर्चे करो।
गगन गुंजार बीच रीझ रीझ राजी हुवा,
जोविया जूवा ज्‍यूं कर्म कांनी।
आप ही आप का जाप ज्‍यां जपत है।
सिखर सुण शब्‍द अनहद वाणी।
अलख स्‍थान लखे कोई लिखमा।
ब्रह्म कूं चीन्‍हे सोही ब्रह्म ज्ञानी।।7।।

जाण रे जाण अजाण क्‍यूं होय रहयो,
भरम्‍या क्‍यूं कुटम्‍ब कुल देख न्‍याति।
कुण्‍ड़ के कुबध में काई हरि बीसरे।
आध अन्‍त काल के होवे कुण साथी।
चेत चितार करतार मत बीसर।
काल हेरू फिर दिन राती।
काल की झपट में कोई नहीं उबरियो।
देव दानव दुनिया देख देख जाती।
भर्म अरु कर्म भेदीयां बिना।
भगत और जगत रंग कुण राति।
लखिउपाव अकाज सब लिखमा,
राम राम रट दिन राति।।8।।

राम की रेस जहां कूड़ नहीं क्रोध है।
मान मकर भर्म दूर जावे।
राग नहीं दोष जहां हर्ख नही सोग है।
विघन विजोग जहां कछु नहीं आवे।
दृष्टि उन मुन लिया राम ऐसे रटे।
वाद विवाद निर्दोष दावे।
जीवत मर रहे बोलता ब्रह्म सूं।
सर्द बीच गर्द होय दर्स पावे।
ध्‍यान धर तत् सार तन में जपे।
शब्‍द सुण पिव सूं प्रीति लावे।
गुरु गम प्रताप ते लखे लिखमा।
राम की रेस कोई सन्‍त पावे।।9।।

कुब्‍धका कोट कूं शब्‍द की चोट कर।
मत के मोर्चे ठीक राखो।
निज नांव की नाल कर ज्ञान गोला कर।
सील को सुरंग से ढाय राखो।
हरि नाम हरि नाम हाका हुवा।
साथ चेतन चडिया।
भर्मकी फौज जब जाय भागी।
बंक के बाटिये घाट सीधे चलो।
गिगन अनहद की घोर बागी।
शब्‍द निशान से सुर्त डोरी लागी तब।
अदल जागी जद भ्रांति भागी,
अलख अस्‍तान लखो कै कोई लिखमा,
ब्रह्म सूं मिल्‍या जद मोज लागो।।10।।

गुरां के शब्‍द सूं हर्ख हृदय हुवा।
समझ अरू शब्‍द मिल प्रेम पोया।
मेल की सैल कर शब्‍द उजास।
विचार का नेत्रो निर्ख लिया।
निखर्या नाम जहां बंक को बाट होय।
त्रिकुटी घाट अस्‍नान किया।
सुनी अनहद की घोर जब श्रवणी।
अलख अरूम दीदार दिया।
जीव अरू पीव कुं एक होय देखिया।
आपका आप जहां ध्‍यान किया।
तन अरू मन कूं तब पर्चा भया।
बोलता ब्रह्म का सुख लिया।
लाय लिखमा रीझ रीझ राजी हुवा।
रूम ही रूम दीदार किया।।11।।

एक अखण्‍ड़ी को दोय बतावे,
दोय कहे सो दोजक जावे।
दीन दयाल दया निधि स्‍वामी।
सो जड़ चेतन जावे न आवे।
भूल पड़ी सो ब्रह्म न पावे।
लिखमा लहर ले सन्‍त सोहो है।
एक अनन्‍त में एक बतावे।।12।।

मोहन मांय भयो मन जातो।
भर्म भंवर बिच थाय न आयो।
स्‍वांस उस्‍वांस बेसांस भयो।
गुरु गम भई जब गोविन्‍द पायो।
लिखमा लहर लही सुख की तब।
रूप अरूप अपर छन्‍द पायो।।13।।

सन्‍त निसाणी सांचो दी ।
मुख कुडन अखे।
वदी अंग आणे नहीं।
नेकी थिर रखे।
सन्‍त शब्‍द सुण विचार के।
तन में तपत न रखे।
निसदिन निस्‍ते नांव वदि।
वांई घर रखे।
रमो राम मन सूंं मिल्‍या।
हित चित से जो न लखे।
वांई कूं सेव जन पर्दे।
पिव पावियो नेडाही नखे।
हरि रस प्‍याला प्रेमदा।
चावे सो चखे।
उंच नीच कुल आत्‍मा ।
गुरु ज्ञान परखे।
लिखमा लाघी दोय ही सेनाण।
दिल में दुरांयत निरखे।।14।।

तन महि जित बीच मन मूला बसे।
आकूब उस्‍वाबा पास रखे।
आठ पोहर ऐ जूदे ईमान की।
नित निवाज कूं याद रखे।
सिखर श्‍याम मिल जा दीन घर याद रखे।
कुब्‍द और क्रोध कूं मार रखे।
गुरु गम प्रताप लखे कोई लिखमा।
आपकी बाद स्‍याही आप लखे।।15।।

हर्ष हृदा बिच हरि हजरत क।
प्रेम प्‍याला लखो सुर्त सांई।
तन में जात बिच कुलका जिखड़ा।
वेद कतेब कूं बूझ मांही।
आकूंब अस्‍ता वाले पाख रोजा करो।
याद अला कूं राख भाई।
अकल अबाब ले सकल सबाब ले।
कफर कूं तोड़ कर दीसे दीन मांही।
गुरु गम की सेल को लखे कोई लिखमा।
भीस्‍त पावोगे बदगी कि मांही।।16।।

सतगुरु हम पर रीझिया,
किया एक प्रसंग।
उलट्या बादल प्रेम का,
भीज गया सब अंग।।

अन्‍तर भीगी आत्‍मा,
हरी हुई बनराय।
प्रेम कमल कलिया फली,
गूंथ ज्ञान का हार।।

मनछा मालण चतुर है,
गूंथ कियो तैयार।
भर्या छाबड़ छब भर्या,
गई हरि दरबार।।

लिखमा मौजां लग रही,
कृपा करो करतार।

मना भाई इण विध सिमरण कीजे mana bhai in vidh simaran kije shashi ghar



मना भाई इण विध सिमरण कीजे,

शशी घर सूर सूर घर शशी है,

संग में सुखमण लीजे ।।टेर।।


अजपा जाप आप में दरसे,
स्‍वांस स्‍वांस गिण लीजे।।1।।


चार वेद ब्रह्मा का लेकर,
पद्मासन कीजे।
शब्‍द तणा समसेर हाथ ले,
नगर सेेठ हो रहीजे।।2।।
 
नामी नाम निर्त कर केवल,
शब्‍द सोहम रट लीजे।
प्रेम जोत रा उड़े पतंगा,
सत बून्‍द बरसीजे।।3।।


बिखमी बाट में अंकरा रस्‍ता,
भंवर गुफा भल कीजे।
उगिया भाण बीत गई रजनी,
तिमिर दूर करीजे।।।।

गेबी गुप्‍त घुरे चोघडिया,
मद री आवाज सुणीजे।
सर्वज्ञी श्‍याम सकल घट व्‍यापक,
इण विध अलख लखीजे।।5।।

भीतर भय भगवत रा राखो,
थारी दुरमति दूरी कीजे।
कह ''लिखमो'' लिख लिख अणभे,
थारां दिल बिच दर्सन कीजे।।6।।

उसमें क्‍या जाणे से सारा usme kya jane se sara jane janan hara



उसमें क्‍या जाणे से सारा, 

जाणेे जाणण हारा ।।टेर।।


रणुकार के उपरे,

सोले आंगल परियाणा

मति सोहनी नेणां निरख्‍यां,

नाम वेद में ज्‍यांणा।।1।।


इन्‍दर भाण के उपरे,

तेज आकाशा तारा।

यहां भी शक्ति वहां भी शक्ति,

शक्ति का विस्‍तारा।।2।।


रूप बिना एक देवल दरसे,

अपरम रूप अपारा।

दो अक्षर से करो दोस्‍ती,

जब उतरो भव पारा।।3।।


चौदह लोक उसी का चाकर,

सायब है कर्तारा।

''लिखमीदास'' वहां घर पहुंचा,

देहि बिना दीदारा।।4।।


ओउ से काया भई सोउ,

सोउ से मन होय।

नीर निरंकार स्‍वासा भई,

''लिखमीदास'' भल जोय।।5।।

हवाल फकीरी कांई फिकर havaal fakiri kai fikar nis din tan



हवाल फकीरी कांई फिकर, 

निस दिन तन विचदे फेरी।।टेर।।


करणी हन्‍दा कुतक लिया संग डोले,

ज्‍यां सुं दुबद्या पूर बसे चेरी।

मत मुकाम मांही रहे माता,

सुर्त पकड़ घर घेरी।।1।।


खपनी  पेर क्षामारी खेले,

टोपी पहर ले प्रेम करी।

वह रहे खुस्‍याल बाल में हाई,

ज्‍यां सूं कलह कल्‍पना नहीं नेड़ी।।2।।


वांके चेला पांच हुक्‍म में हाजर,

परचावे बेरी।

 चित चाैैैकी पर निश्‍चय बैठे,

मिल रहे श्‍याम समझ सेरी।।3।।


अकल अखाड़े ध्‍यान की धूणी,

ज्‍यां के शब्‍द निवास लायो अंगरी।

हरदम रहे हजरत सूं हाजर,

निर्जन नाथ लिया हेरी।।4।।


 अलख अज्ञात नहीं रूप वर्ण,

गुण वांको भेद रही ममता मेरी।

कह ''लिखमी'' कुदरत का दर है,

रब रजैया है तेरी।।5।।

कर मन आवाज अलख रे द्वारे kar man awaaz alakh re dware fart fakiri



कर मन आवाज अलख रे द्वारे,

फर्ट फकीरी धीरू मन धारे, 

आत्‍म देव पुकारे ।।टेर।।


चेतन राम उतारी चीरी,
पेहल्‍या लिख्‍या पुकारे।
सांंई म्‍हाजी रोजी सकल ने पूर्वे,
जीया जूण सब सारे।।1।।

सांई म्‍हारो रोजी सकल ने दूवै,
करणी कमज्‍यां लारे।
मेली कलम ठिकाणे सेति,
सही ठिकाणे सारे।।2।।

देख्‍या भाव सकल दुनिया रां,
केई कोपे केई हारे।
कोपे ज्‍यारे कुलफ झड़ीया,
सांई म्‍हारो कोप निवारे।।3।।

घडिया देव घड़ी में घड़ीया,
सब अणघड़ के सारे।
एक घड़ी बाबो अणघड़ विचारे,
सब घडिया ने मारे।।4।।

ऐसा हवाल किया हरि अपने,
ओठे वर्ण अढारे।
कह ''लिखमाेे'' भगवत री कृपा,
भवसागर में तारे।।5।।

मैं उघ राताली तनिक भरछाक हुआ अब मदमाता me ugh ratali tanik bharchak hua ab madmaata



मैं उघ राताली तनिक भरछाक

हुआ अब मदमाता ।।टेर।।


शब्‍द प्‍यालो म्‍हारे सतगुरु पायो,
अर्स पर्स दरस्‍या दाता।।1।।

भर्म कर्मधर भूल गया है,
उनमुनी पिया असल छाता।।2।।


सुखमण के घर सुर्त कलाड़ी,
राम रस पाप किया छकता।।3।।


अणभे री महर लहर सूं आई,
होय मतवाल भया बकता।।4।।

रूम रूम मैं चढ़ी खुमारी,
फेर पिवण की है ममता।।5।।

''लिखमा'' लाभ हरि रस पिया,
अनन्‍त छका फेर है मुक्‍ता।।6।।

अमल एक राम नाम का रिजे amal ek Ram naam ka rije jyaa su levat magan



अमल एक राम नाम का रिजे,
ज्‍यां सूं लेवत मगन रहिजे।।टेर।।


राम अमल एक गुरु बताया,
सन्‍त सोबत सूं सीखिजे।
डोढा दूणा करी चोगणा,
लीया है तो फेरूं लहजे।।1।।

याद अमल रहे आठो पहरां,
अमली एम कहिजे।
रूम रूम बिच रहे खुमारी,
उन मुनी झेरां जीले।।2।।

पिड सूं लागी पर्तन डूटे,
नित सवाया लीजे।
राम अमल सूं रहे रातो,
और अमल क्‍या कीजे।।3।।

ऐसा अमल करे सन्‍त सूरा,
पोता जल कहिजे।
''लिखमा'' लियासो फेर लेसी,
कर्मा जड़ कदां पतिजे।।4।।

एलम हरि रे नाम रो सतगुरु दिया बताय alam hari re naam ro satguru diya batay



एलम हरि रे नाम रो,

सतगुरु दिया बताय ।।टेर।।


और एलम सत् शब्‍द है,

सतगुरु दिया सिखलाय।

पतवाणा प्रतीत सूं,

एलम भेट्या घट मांय।।1।।


भरम भूतसा काढिया,

लग रह्या तन के माय।

उपज्‍यो विचार एलम ते,

तब भरम सभी भग जाय।।2।।


दुबद्या डाकण देह की,

खबर बेहुणो खाय।

इकतारी निज मंत्र से,

दुविधा जाय बिलाय।।3।।


सांसे सर्प की झाट से,

शोक जहर चढ़ जाय।

मिले ज्ञान पुरुष गारडु

सांसा जाय बिलाय।।4।।


ब्रह्म वेद से मिल रहे,

कर्म राेेग कट जाय।

''लिखमो'' एलम अलेखदा,

सहजा होत सहाय।।5।। 

बेजो नांव रो कोई बणसी राख विवेक bejo naav ro koi bansi rakh vivek



बेजो नांव रो कोई बणसी राख विवेक,

 निर्गुण गांव रो।।टेर।।


नला भरी जे नामरा,
तंत तार मत तोड़।
अकल अरीटयो फेरले,
टूटे फेर ज्‍यूं जोड़।।1।।

गुरु शब्‍दांं तांणो तणियो, 
हालो होय ले हुसियार।
तार हजार इकीस छिव से,
तार तार करतार।।2।।

प्रेम प्राण सूं पायले,
पांचु पुरुष मिलाय।
कर तन मन ताकीद सूं,
शब्‍द संवारे बाय।।3।।

तुर्गुण तुर्पर चोढले,
क्षमा खुंटले बांध।
कर सांतर सत सूत ने,
टूटे ज्‍यूं दे सांध।।4।।

हरदम हरख कर पावड़ी,
प्रीति पिणछ पर गाढ़।
सुर्त निर्त दोय डोरड़ी,
चेतन चक्री चाढ़।।5।।

समझ साल में बैठ ले,
नली नाम री बाय।
राम राम रसके भणो,
हाथे हेत लगाय।।6।।

कुल रूईरी एक है,
मेहनत मांही मदार।
भील माल सारू मिले,
कीमत ज्‍यूं करतार।।7।।

ब्रह्म बेज बिरला बणे,
लाखी मंजो कोय।
कह ''लिखमो''लावो भलो कोई,
भणसी हरिजन होय।।8।।

हो कारीगर दाता चरखो अजब बणायो ho karigar data charkho ajab banayo



हो कारीगर दाता चरखो अजब बणायो,

हो अवगत अविनासी चर्खो अजब बणायो।।टेर।।


चित कर चूप कियो कारीगर,

चर्खो घड़ उपायो।

सब सेनाण कसर बिना किनो,

समझो सोही सरायो।।1।।


तन तूमण बिच कर्णी को कणियो,

सतगुरु समझ बतायो।

ताड़ी पांच पचीस कर सेठी,

बुद्धि को बन्‍ध लगायो।।2।।


धर्म भजन थम्‍भल्‍या शुद्ध सारण,

सूधे सूत बणायो।

क्षमा पूतली चित चमरख बीच,

शब्‍द ताकलो लायो।।3।।


राखे मन री माल दया दावण बिच,

सोरी बहु सवायो।

काते सूत प्रेम री पूणी,

तार ताक ले आयो।।4।।


तू कारीगर भारी हरि,

सो इकधारी, जद चख रस आयो।

''लिखमा'' लाभ ध्‍यान धर लाधे,

इयूं चर्खे चित लायो।।5।।

मारो मन मैलो धोउंगाेे maro man melo dhoungo haalo bhai ganga



मारो मन मैलो धोउंगाेे, 

हालो भाई गंगा न्‍हावण ने।।टेर।।


धन सिंह राजा मिन्‍दर चुवायो,
अजब बारणा रहवाने।
जाली राख झरोखा राख्‍या,
तीन लोक देखबाने।।1।।

नसी सोध कर मैं धूणी धुकाई,
भंवर गुफा में रहवाने।
घर धर सुर्ता फिरे भटकति,
उण ने घर बैठाबा ने।।2।।

हुक्‍के मांही जल गलावे,
उपर चिलम चढ़ावाने।
ताम्‍बा बरणी चिलमिया,
सन्‍ता ने भर भर पाबाने।।3।।

एक टकाे माली ने दिन्‍हों,
लेग्‍यो भाग दिखाबा ने।
उण माली म्‍हाने दियांं फूलड़ा,
शिव रे मुगट चढ़ाबा ने।।4।।  

एक टका में लिवि मिठाई,
ख्‍वाजा पीर मनाबाने।
गुरु खिंवजी ''माली लिखमो'' बोले,
हालो भाई पुष्‍कर न्‍हावाने।।5।। 

बंगला देख्‍या अजब बिहार bangla dekhya ajab bihar jyame nirakar deedar



बंगला देख्‍या अजब बिहार, 

ज्‍यांमे निराकार दीदार।।टेर।।


इस बंगला रे दस दरवाजा,
कोट बण्‍यो चहुंधार।
पांच पचीस चढ्या पाखरिया,
लूट लियो बाजार।।1।।

इस बंगला में बाजा बाजे,
झालर शंख सितार।
सत री घोर धुरी ब्रह्माण्‍ड में,
दशवे देव द्वार।।2।।

इस बंगला में अडसठ तीर्थ,
बीच बहे गंगधार।
झीणी चर्बी सिखर नावणो,
दुर्स करो दीदार।।3।।

इस बंगला में ''लिखमो'' लखिया,
उतरया पेले पार।
गुरु प्रताप साध की संगत,
जहां पाया दीदार।।4।। 

हेली ये मान बचन सत मेरो heli ye maan vachan sat mero bhatkat kem



हेली ये मान बचन सत् मेरो,

भटकत केम फिरयो मन कंगर, 

तांही में पिव तेरो।।टेर।।


धर विश्‍वास हाल गुरु वचना,
प्रेम प्रीत कर हेरो।
घट में पुरुष बसे अविनासी,
अजर अमर घर तेरो।।1।।

परसो मेेल देश प्रीतम को,
बिन शशी भाण उजियारो।
 त्रिविध ताप तांहि नहीं व्‍यापे,
होवे कर्म झक झेरो।।2।।

अटल स्‍वांग भाग धन तेरो,
निसदिन भर्म भिचारो।
होय निसंग संग लालन की,
में सो अनन्‍द घणेरो।।3।।

च्‍यारूं वेद पुकारे प्रकट में,
निसदिन करे निवेरो।
कह ''लिखमो'' भगवत री कृपा,
मिटे जन्‍म मरण रो फेरो।।4।। 

हरि सूं समझ सू लिव ल्‍याई hari su samaj su liv laai duniya dekhat



हरि सूं समझ सू लिव ल्‍याई,
दुनिया देखत भूल बनाई।।टेर।।


मात पिता कामण सुत सागे,

मोह माया लिपटाई।

मकड़ी जाल मांड मांही उलज्‍यो,

फिरे आपदा मांही।।1।।


हरि की भक्ति जगत नहीं जाणे,

करे आपदा कांई।

हर्ख शोक सूं सोही बाधा,

बुद्ध बिन देख चूके डाई।।2।।


संकट पड़े सुद्ध बुद्ध सब बिसरे,

हरि भज हम की डाई।

आवे आयजूरा जम घेरे,

कारी लगे न कांई।।3।।


''लिखमो'' सोवे निकमा जग अंधा,

भजन बिहुणा भाई।

हरि ने भजे सरे सब कारज,

सायब करे सहाई।।4।।


जग देखण आंधा मत हालो jag dekhan andha mat haalo kiyodi kamai



 जग देखण आंधा मत हालो,

कियोड़ी कमाई एली जावे जावे रे बीरां।।टेर।।


पांच सात भायां मिल मतो उपायाेे,

मतो उपायो भारी रे भीरा।।1।।


दर्पण ले थारी देहड़ी निर्खो,

रूप देख कांई रीझो रे भीरा।।2।।


पकी धड़ीरा तोल मंगावो,

देहड़ी री काण कढ़ावो रे भीरा।।3।।


घर घर सुर्ता फिरे भटकता,

पर यस्‍तु मत हेरो रे भीरा।।4।।


गुरु खिंवजी ''माली लिखमो'' बोले,

सदेहि अमरापुर जावो रे भीरा।।5।। 

सन्‍ता बीज कहां से आया santa beej kaha se aaya karo vichar saad



सन्‍ता बीज कहां से आया,

करो विचार साद विश्‍वासी, 

सांचो सांच बलाया।।टेर।।


कौन बीज से इण्‍ड भन्‍या,

कौन बीज से पिण्‍ड रच्‍या।

कौन बीज से सिर मुख जडिया,

कौन बाट बरताया।।1।।


कितना मात पिता का कितना,

कितना शीतल छाया।

कितना स्‍वेत रगत है भेला,

कितना जुगत जावण जमाया।।2।।


क्‍या कहु, कुण मेरी माने,

अभीया एक उलझाया।

अभीया एक में कौनसा अच्‍छर,

कौन स्‍वरोदय आया।।3।।


बीज अमर घट घट में जडिया,

जरा मरण नहींआया।

''लिखमा'' भेद अचम्‍भो,

पाखण्‍डी नहीं पाया।।4।।

बार बार समझायो रे जीवड़ा bar bar samjayo re jivada janam gamayo



बार बार समझायो रे जीवड़ा, 

जनम गमायो ते इहांई।।टेर।।


स्‍वामी सिमरूं सुण्‍डालो,

सारद माता मंमाई।

गर्भ चेतावनी सुख सुं वर्णू,

जीव ब्रह्म री ओलखाई।।1।।


जिवड़ो अर्ज करे हरी आगे,

मेलो मात लोक मांही।

करसूं पुन पाप ने पेलूं,

दया राखसूं देह मांही।।2।।


मात पिता थारे गोत कुटुम्‍बी,

तू रल जासी उंही मांही।

करड़ा कोल करे दगा में,

भूल जाय लो छिन मांही।।3।।


जल की बूंद पड़ी भीतर में,

बीसूं आंगलियां दीन्‍हीं सांई।

थम्‍भ दोय केवल एक बणीयो,

अजब उपायो उण साई।।4।।


हाथ दिया तने पांव दिया है,

नैण दिया निर्खण तांई।

शीश फूल थारे इण्‍डो चढायो,

पवन पुरुष भेल्‍यो मांही।।5।।


मृत्‍यु लोक में जन्‍म लियो,

अवाज हुई दगा मांही।

तीन नाम भगवत रा लीन्‍हां,

भूल गयो उन छिन मांही।।6।।


पांचा बरसां हुयो दोजकी,

डोलण लागो घर मांही।

पांच पनरा हुयो पचीसां,

अबे रामजी है कांई।।7।।


डिग मिग नाड़ डोलबा लागी,

पगल्‍या ठांय टिके नांही।

सब तन थका सिमरण झाली,

अब सिमर्या होवे कांई।।8।।


हुक्‍म हुयो सायब रे दूतां,

जम आया लेवण तांही।

फिरे दोला बूझण लागा,

ते सुखरत करिया कांही।।9।।


नाम न लीन्‍हों धर्म न कीन्‍हों,

दया न राखी देह मांही।

मात पिता ने घणा सताया,

पाप किया निज हाथां ही।।10।। 


कण्‍ठ पकड़ नेे गरडु जूत्‍या,

दु:ख पाउ हुं देह मांही।

काया नगर में रोलो मचियो,

मार पड़े है गुर्जाई।।11।।


धर्मराज जी री पोळिया,

लेखो मांगे वो सांई।

साच बोल सायब री दर्गा,

तें सुकृत कीन्‍हों कांही।।12।।


नाम न लीन्‍हों धर्म न कीन्‍हों,

दया न राखी देह मांही।

साध सन्‍ताे री करी ठचेरी,

कलक लगायो हाथां री।।13।।


कीड़ा खावे मुग्‍दर भारे,

हाथ भरावे थाम्‍माई।

दु:ख पांउ दोजक में पडियो,

जाबा न दे भगवत तांई।।14।।


हाथ जोड़ने करूं वीनती,

मात लोक मेलो सांई।

कर सूं पुन पाप ने बेलूं,

स्‍वांस स्‍वांस सिमरूं सांई।।15।।


भुगति जूण चोरासी जीवड़ा,

सात लोक मेलू नाही।

करस्‍यो सीला डूंगर उपर,

घास न उगे थां मांही।।16।।


अनन्‍त सन्‍ता रे शरणेे आयो,

गुरां पीरां सूं गम पाई।

गुरु खिंवजी ''लिखमो'' जस गावे,

हरि सिमर्या निर्मै थांही।।17।। 

भव सागर में भूलो रे अन्‍धा bhav sagar me bhulo re andha koi karne te



भव सागर में भूलो रे अन्‍धा,
कोई कारणे ते देह धरी।
भूलो नाम भर्म में उरज्‍यो,
ओ कांई पहरयो केवारी।।टेर।।


मानखो अर्ज करे हरि आगे,
अब तो मेलो संसारी।
धर्म करूं भजन नहीं भूलूं,
सिमरण करस्‍यो इकथारी।।1।।

उदर आया उन्‍दा लटके,
बाहर काढ़ो गिरधारी।
मृत्‍यु लोक में थाल बाजियो,
तीन नाम ले तत्‍सारी।।2।।

पांच सात रम खेल गुजार्या,
तुरेर तार हूवो त्‍यारी।
पांच पचीस री सलाह सीखकर,
करी हाकमी राजा री।।3।।

 
हुं में हरख्‍यो मैं में सिरख्‍यो,
भजन भूल गयो बन्‍दारी।
मारे मिनख माया रे कारणे,
आंधा धुन अंधारी।।4।।

वादो आयो मांदो पड़सी,
ताता नीर हुया त्‍यारी।
जमदूत सायब रे घर रा,
सुग्‍दर मार पड़े भारी।।5।।

धर्म राजजी लेखा मांगे,
काम किया ते अन्‍त भारी।
उन्‍दो टेर मंमाई पाडो,
हुक्‍म हुयो है दरबारी।।6।।

ममता मारे जीवांरे मारे,
उंधा लटके अहंकारी।
कह ''लिखमो'' संता रे सरणे,
सुर्त राख इकपासारी ।।7।।

ऐसी फेरे कोई संत सुजाण aisi phere koi sant sujan hiya bich hari mala



ऐसी फेरे कोई संत सुजाण, 

हिया बिच हरिमाला।।टेर।।


फेरी ध्रुव, प्रहलाद,
करिमां कर्मो का जाल।
फेरी नानक दास कबीर,
अन्‍दर कर उजियाला।।1।।

फेरी रामानन्‍द, नवनाथ,
दत्त पंथ रूखवाला।
फेरी नारद मुनी,सुखदेव,
फेरी गोरख माला।।2।।

फेरी गोपीचन्‍द,भरथरी,
बलख बुखारे वाला।
फेरी शेख फरीद वाजीद,
कमाल कबीरे वाला।।3।।

फेरी हरिश्‍चंद्र,युधिष्‍ठर,
बलि बैठा सत धर्मशीला।
फेरी कर्षा मोरध्‍वज,
संत विदुरजी विर्धा वाला।।4।।

फेेेरी पीपा, रविदास,
खुलिया तन का ताला।
फेरी कालू सुर से,
न सबका सांसा टलिया।।5।।

फेरी नामदे,नरसी,तुलसी,
प्रेम पिया मतवाला।
फेरी सजन, गजराज,
काज प्रभु ध्‍याया माला।।6।।

फेरी दादू धने फरसराम,
खोजी कू सूजी माला।
फेरी बकिने कुबे छदाम,
मित्र किया गोपाला।।7।।

फेरी कीते हरि बालमिक,
बेठा सुन को साला।
फेरी अगर तिलोकचंद,
हरिदास के हित माला।।8।।

फेरी सिरियांदे सांची,सम्‍भया,
राम भया रिछपाला।
सुत मंजारी का राम राख्‍या,
जलती अगन ज्‍वाला।।9।।

पाया भगत भाीलणी बोर,
खीच कदमा बाला।
फेरी द्रोपदी कर दिल पाख,
मीरा के मोहन माला।।10।।

फेरी सिद्ध साधक ऋषि मुनी फेरी,
ज्‍यांरा हरिमाला।
''माली लिखमा'' लाधी वेतो फेर,
झूमो साधा री चाला।।11।।

हरिजन के हृदय बिच माला harijan ke hridya bich mala jaake ghat pind bhaya




हरिजन के हृदय बिच माला,
जांके घट पिण्‍ड भया उजियाला।।टेर।।



मन की तपसी जन कोई जपसी,
ज्‍यांके खुल गया तन दा ताला।
मन पवन प्रशण होय फेरे,
तो कटे कर्म का जाला।।1।।

तीर्थ एक गरीबी नावे,
भर्म तिलक मतवाला।
गोपी चन्‍दन ज्ञान का लगा,
उतरे नहीं तिलकरा।।2।1

कण्‍ठी बणी सील की सेजो,
भाव भक्ति धर्मसाला।
ज्ञान मंडी में गुरु गम पाया,
सतगुरु शब्‍द उजाला।।3।।

आतमदेव सही कर पूजे,
निस दिन सांझ सवेरा।
सुर्ति निर्त सेवा में सांची,
परसे देव द्वारा।।4।।

पांचो तार एक सुर आगे,
बाज रया इकसारा।
वह ''लिखमो'' गावे घर मांही,
रीझे सिरजण हारा।।5।। 

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