राग रेखता भजन raag rekhta bhajans lyrics



:: राग रेखता ::

टेरत हूं बारबार कयो मान मेरो,
काम बिना भटकत क्‍यूं फिरत ही अवेरो।
आणत घट घट मांही दियो हुता पहरो।
भूलाय कट भाज गई, ऐसो तेरो जोरो।
कर तोड़ तोसू कायणी, में करती हुं नहेरो।
अज ऐसे मान मोहरी कर जोड़।
लिखमो कहे टक श्‍याम से तुक जोड़।।1।।

देख देख रे देखिये सब लिखा खेल,
मैं मत मगरूर क्‍यूं करता हैै। 
भक्ति भेदत नहीं भर्म भूला,
फिरे जोय जोय रे जन्‍म क्‍यू खोवता है।
हाजिर हक हजूर को दूर मत जाणे देख।
जोया जूण क चूज पजोवता है,
हरि हरदम हाजर लेत है।
लिखमा जोय जाण जैसा हो ओ होवता है।।2।।

मन मान सुख आलसूं और की यार सूं,
फेर किनकी आश्‍क कीजीये जी।
यार तो यादजी हक हाजर खड़ा,
रीझ रीझ महरे नित लोरीये जी।
नाम सुणाय बिछोड़ीये जी,
ओर तो इश्‍क सब अल्‍प है।
लिखमा अलख सूं आश्‍क जोडियेजी।।3।।

हक ही हक विचार ले,
झीखर में मकर का काम कांई।
मन कूं मार ले चेतले दोय दिन मांही।
ओर की अर्ज से गर्ज कैसे सूझे,
कर फकर फरीयाद एक पिव तांही।
लिखमा बुस्‍त लाध सी,
कुछ बंदगी कियां।
केहर तज महर ले मांही।।4।।

दाता दीसे एक कूं सब ही जांचो भाई,
लख चौरासी जीव जीवों को रिजक निवाजे सांई।
जीव जैसे दे चुण अलख उदर परवाणे।
चोकस देई चितारे सवारे भूल न जाणे।
उनकी सदावर्त दिन रेण बंटत लेवे सभी कोई।
सगत मुक्ति फल देण ज्‍यां दाता हरि सोई।
तीन लोक तारे तांका दाता दाता दिसे एक।
लिखमा दाता अलख है वहारे मोद बण्‍या अनेक।।5।।

देखिया एक अलेख सब भेख में,
भूला दोय के भर्म मांही।
नाम निज तंत ज्‍यूं सत रा तार है।
नीवण ज्‍यू नीरकी सीर है आही।
चेत दिन च्‍यार की बार है बावरे।
देह को देवता देह के मांही।
कर जोड़ लिखमो कहे गेल अनेक है।
सही है सर्व बीच एक अलख सांई।।6।।

मान रे मान तू जाण जगदीश कूं,
आण इतबार देख कर्तार कांनी।
ज्ञान गेले चलो सांच संग होय विश्‍वास,
के वासी ज्‍यूं विश्‍वास जाणी।
विश्राम जब जीव कूं पिव पर्चे करो।
गगन गुंजार बीच रीझ रीझ राजी हुवा,
जोविया जूवा ज्‍यूं कर्म कांनी।
आप ही आप का जाप ज्‍यां जपत है।
सिखर सुण शब्‍द अनहद वाणी।
अलख स्‍थान लखे कोई लिखमा।
ब्रह्म कूं चीन्‍हे सोही ब्रह्म ज्ञानी।।7।।

जाण रे जाण अजाण क्‍यूं होय रहयो,
भरम्‍या क्‍यूं कुटम्‍ब कुल देख न्‍याति।
कुण्‍ड़ के कुबध में काई हरि बीसरे।
आध अन्‍त काल के होवे कुण साथी।
चेत चितार करतार मत बीसर।
काल हेरू फिर दिन राती।
काल की झपट में कोई नहीं उबरियो।
देव दानव दुनिया देख देख जाती।
भर्म अरु कर्म भेदीयां बिना।
भगत और जगत रंग कुण राति।
लखिउपाव अकाज सब लिखमा,
राम राम रट दिन राति।।8।।

राम की रेस जहां कूड़ नहीं क्रोध है।
मान मकर भर्म दूर जावे।
राग नहीं दोष जहां हर्ख नही सोग है।
विघन विजोग जहां कछु नहीं आवे।
दृष्टि उन मुन लिया राम ऐसे रटे।
वाद विवाद निर्दोष दावे।
जीवत मर रहे बोलता ब्रह्म सूं।
सर्द बीच गर्द होय दर्स पावे।
ध्‍यान धर तत् सार तन में जपे।
शब्‍द सुण पिव सूं प्रीति लावे।
गुरु गम प्रताप ते लखे लिखमा।
राम की रेस कोई सन्‍त पावे।।9।।

कुब्‍धका कोट कूं शब्‍द की चोट कर।
मत के मोर्चे ठीक राखो।
निज नांव की नाल कर ज्ञान गोला कर।
सील को सुरंग से ढाय राखो।
हरि नाम हरि नाम हाका हुवा।
साथ चेतन चडिया।
भर्मकी फौज जब जाय भागी।
बंक के बाटिये घाट सीधे चलो।
गिगन अनहद की घोर बागी।
शब्‍द निशान से सुर्त डोरी लागी तब।
अदल जागी जद भ्रांति भागी,
अलख अस्‍तान लखो कै कोई लिखमा,
ब्रह्म सूं मिल्‍या जद मोज लागो।।10।।

गुरां के शब्‍द सूं हर्ख हृदय हुवा।
समझ अरू शब्‍द मिल प्रेम पोया।
मेल की सैल कर शब्‍द उजास।
विचार का नेत्रो निर्ख लिया।
निखर्या नाम जहां बंक को बाट होय।
त्रिकुटी घाट अस्‍नान किया।
सुनी अनहद की घोर जब श्रवणी।
अलख अरूम दीदार दिया।
जीव अरू पीव कुं एक होय देखिया।
आपका आप जहां ध्‍यान किया।
तन अरू मन कूं तब पर्चा भया।
बोलता ब्रह्म का सुख लिया।
लाय लिखमा रीझ रीझ राजी हुवा।
रूम ही रूम दीदार किया।।11।।

एक अखण्‍ड़ी को दोय बतावे,
दोय कहे सो दोजक जावे।
दीन दयाल दया निधि स्‍वामी।
सो जड़ चेतन जावे न आवे।
भूल पड़ी सो ब्रह्म न पावे।
लिखमा लहर ले सन्‍त सोहो है।
एक अनन्‍त में एक बतावे।।12।।

मोहन मांय भयो मन जातो।
भर्म भंवर बिच थाय न आयो।
स्‍वांस उस्‍वांस बेसांस भयो।
गुरु गम भई जब गोविन्‍द पायो।
लिखमा लहर लही सुख की तब।
रूप अरूप अपर छन्‍द पायो।।13।।

सन्‍त निसाणी सांचो दी ।
मुख कुडन अखे।
वदी अंग आणे नहीं।
नेकी थिर रखे।
सन्‍त शब्‍द सुण विचार के।
तन में तपत न रखे।
निसदिन निस्‍ते नांव वदि।
वांई घर रखे।
रमो राम मन सूंं मिल्‍या।
हित चित से जो न लखे।
वांई कूं सेव जन पर्दे।
पिव पावियो नेडाही नखे।
हरि रस प्‍याला प्रेमदा।
चावे सो चखे।
उंच नीच कुल आत्‍मा ।
गुरु ज्ञान परखे।
लिखमा लाघी दोय ही सेनाण।
दिल में दुरांयत निरखे।।14।।

तन महि जित बीच मन मूला बसे।
आकूब उस्‍वाबा पास रखे।
आठ पोहर ऐ जूदे ईमान की।
नित निवाज कूं याद रखे।
सिखर श्‍याम मिल जा दीन घर याद रखे।
कुब्‍द और क्रोध कूं मार रखे।
गुरु गम प्रताप लखे कोई लिखमा।
आपकी बाद स्‍याही आप लखे।।15।।

हर्ष हृदा बिच हरि हजरत क।
प्रेम प्‍याला लखो सुर्त सांई।
तन में जात बिच कुलका जिखड़ा।
वेद कतेब कूं बूझ मांही।
आकूंब अस्‍ता वाले पाख रोजा करो।
याद अला कूं राख भाई।
अकल अबाब ले सकल सबाब ले।
कफर कूं तोड़ कर दीसे दीन मांही।
गुरु गम की सेल को लखे कोई लिखमा।
भीस्‍त पावोगे बदगी कि मांही।।16।।

सतगुरु हम पर रीझिया,
किया एक प्रसंग।
उलट्या बादल प्रेम का,
भीज गया सब अंग।।

अन्‍तर भीगी आत्‍मा,
हरी हुई बनराय।
प्रेम कमल कलिया फली,
गूंथ ज्ञान का हार।।

मनछा मालण चतुर है,
गूंथ कियो तैयार।
भर्या छाबड़ छब भर्या,
गई हरि दरबार।।

लिखमा मौजां लग रही,
कृपा करो करतार।

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