ऐसी मेरे सतगुरू जुगति बताई aisi mere satguru jugti batai tate shabd



ऐसी मेरे सतगुरू जुगति बताई,
तांते शब्‍द साहिबी पाई।।टेर।।


उचरया शब्‍द भक्ति जद जागी,

हृदय हरख बंधाई।

हरख हूआ सुख दुख सब बिसरिया,

मिटगी दुरमत दाई।।1।।


खोजत शब्‍द कुबद  भई काने,

सुद बुद शांंति आई।

धोखा मिट्या ध्‍यान धुन लागी,

जब मिट्या गुमान बड़ाई।।2।।


भेदया शब्‍द भरम पर टूटा,

तिमर मिट्या तन दांई।

 आया अर्थ अलख ओलख्‍या,

दरस्‍या हरि दिल मांही।।3।।


शब्‍द सुख हुवा तन मन पर्चे,

सरि सगमरी आई।

अर्स पर्स सुखमण घर साहिब,

रूम रूम में राई।।4।।


आपा देख सकल में देख्‍या,

जड़ चेतन हरि राई।

लिखमा लाग जाक बांकू,

भर्मन भूला भाई।।5।।


लग्‍या शब्‍द गुरू रंग सो है संग सदाई lagya shabd guru rang so hai sang sadai bhajan lyrics

 


 

लग्‍या शब्‍द गुरू रंग सो है संग सदाई,
समझ शब्‍द मिल दिल बिच अलख लखाई।।टेर।।


सतगुरू आदु सेण बतलाई,

पर्चा सूं पाया पिव मेरा मुझ मांही।

हुं हूति मेमत मान गुमान भरम भटकाई,

हुई खबर बरोबर खाख पाख लिव ल्‍याई।।1।।


हुइ लग्‍न में मगन लीन लिव लाई,

पाया पिव प्रेम परसाह प्राप्‍त पाई।

नित नित नवला नेह निभावे सांई,

संग सुखमना के घर पिव बितलाई।।2।।


जांका सुख अपार कहत न आई,

जोया बोलत ब्रह्म अरूप भर्मना नांही।

सूरत शब्‍द के संग परम पद पांई,

लिखमा कहे कोई सन्‍त सदा सुखदाई।।3।।

अलख लख अधर अखंड़ी काया alakh lakh adhar akhandi kaya so sarvangi

 


अलख लख अधर अखंड़ी काया,
सो सर्वंगी सकल समाया ।।टेर।।


महर हुई मेरे सतगूरू की,

सत् शब्‍द सुणाया।

सुणीया शब्‍द जीव सुख पाया,

ईयुं विश्‍वास समाया।।1।।


समझ शब्‍द मिल मनके पर्चे,

चेत चरण चित लाया।

दिल सुं मालिक दरस्‍या देह मांही,

आप आपकुं पाया।।2।।


इडा पिंगला सुखमण के घर,

बंक बाट बह आया।

दस्‍यीदेव सूरत सेवा में,

रूप वर्ण बिन राया।।3।।


सोहम सिखर बिच श्‍याम सही कर,

रीझ रीझ रिझाया।

रीझिया जद भेद बताया,

रूम रूम मांही लखाया।।4।।


बोलत ब्रह्म कमीसूं कोन,

और सकल सबसब माया।

जिन ओउ सोउ बिच अवगत,

आशण अधर ठहराया।।5।।


जुगति भक्ति की जन कोई जाने,

पस परम पद पाया।

अरस परस होय एकमेक होय,

उहांभो अगम बताया।।6।।


अपरम पार अगम गुरू ऐसा,

खोज्‍या जैसा पाया।

लिखमा कहे कहां लग खोजूं,

ज्‍यां पाया ज्‍यां गाया।।7।।

अलख लख जुगती मुक्ति री पाई alakh lakh jugti mukti ri paai bhav sagar bich



अलख लख जुगती मुक्ति री पाई,
भवसागर बिच बह जात।
मोही सतगुरू बांह पकड़ाई,
गुरूजी म्‍हाने ठीक बताई ठाई।।टेर।।

 

गम गणपत शारद दिवी सोजी,

सहजां सुद बुद पाई।

मनमें उचरया ब्रह्म बिचारी,

सत् शब्‍दों ओलखाई।।1।।


जागो जूनी कला गोसाई भीड़ पर्या भगतां रे भेला jago juni kala gosai bheed parya bhagta re



जागो जूनी कला गोसाई,
भीड़ पर्या भगतां रे भेला संकट मेटे सांई।।टेर।।


दरगा अलख मदीने अल्‍ला,
झूजा रेर गुसांई।
नाम धर धोखाई,
धामो कदम रसूल केवाई।।1।।

भजमन गिरधारी गोविन्‍दा bhaj man girdhari govinda bhajan lyrics


 

भजमन गिरधारी गोविन्‍दा,
सालगराम सोही सब सामिल,
और धोखे का धन्‍धा।।टेर।।


कर्ता पुरूष किया कमठाणा,

कर पांच तीन का धंंधा।

धंंधा में सब जुग भरमन्‍दा,

जो बिच अलख लखन्‍दा।।1।।


एक मन ध्‍यावे सोही फल पावे सरसी काम ek man dhyave sohi fal pave sarsi kaam



एक मन ध्‍यावे सोही फल पावे,
सरसी काम जिनाईन्‍दा,रामो पीर पूजाईन्‍दा।।टेर।।


सुरत मांत सारदा सिंवरू,

गणपत देव मनाईन्‍दा।

राम कंवर राजेश्‍वर सिंवरूला,

पाप झर जाईन्‍दा।।1।।


दोहा लिखमा जी doha likhamaji mali

:::दोहा:::


नीवण बिन एक नीवण,

गुरू नीवण कर जोड़।

निवणज देवी शारदा,

भूल्‍या देवे जोड़।।1।।


रामां थे अजमालरा,

मती आप रे मोजी।

काेेेेढिया रा कलंक झाड़ बापजी,

दो भूखा ने रोजी।।2।।


म्‍हारी शरम राजरे शरणे, कलम राखज्‍यो जनम सुधार mari sharam rajre sharne kalam rakh jo janam



 म्‍हारी शरम राजरे शरणे,
कलम राखज्‍यो जनम सुधार।।टेर।।


शारद माय भाय आई म्‍हारे,

रिदसिद द्यो गणपति दातर।

राम कंवर सूं ताली म्‍हारे,

रिद्ध रोजीरा भरिया भण्‍डार।।1।।


हो अजमल सूत अजमत थारी ajmal sut ajmat thari bhakta ra birad



 हो अजमल सूत अजमत थारी, 
भक्‍तां रा बिरद बधावण तारण,
सुदबुध रो रातारि।।टेर।।


सिंवरू सिद्ध रामदे राजा,

धरूं ध्‍यान इकतारी।

ओलखियो शब्‍द अंतर जामो,

परचे पर उपकारी।।1।।


आई म्‍हानेे संत शब्द इकतारी aai maane sant shabd iktari hai hari ek



आई म्‍हानेे संत शब्द इकतारी,
हे हरि एक एक कर जाणो,दीसे दुबधा न्‍यारी ।।टेर।।


ओमकार अटल अण्‍घड़, 

सत सोहू माया थारी ।

माया का विस्‍तार ब्रह्म बिच, 

रचना कुदरत थारी।।1।।


माया में मोह रहता हैै, 

हो अला ओमकारी।

व्‍यापक ब्रह्म भर्म सूं भूला, 

सो कर्म अधिकारी ।।2।।


मच्‍छ कच्‍छ हूवो तूही, 

हर‍ि बारा तू नरसिंह नखधारी।

बाबन होय बलद्वार पधारियो, 

परशराम अवतारी।।3।।


राम अवतार हुयो तू राघव, 

धन छलियो कलाधारी ।

तूही कृष्‍ण रणछोड़ द्वारका, 

गोविन्‍दो गिरधारी ।।4।।


कलयुग दसवी कला पूजाई, 

हुवा रामदेव छत्रधारी।

थे निकलंक होय सो नारायण, 

कर कालिंगा पर त्‍यारी।।5।।


बुध अवतार ओलखियो बुध से, 

सत् असत् शब्‍द विचारी।

से समदृष्टि साधु बड़भागी, 

दुतिया मिटही यारी।।6।।


सिद्ध साधक संता सब सिवरे, 

जीव ज्‍यां जोत तुम्‍हारी।  

तुम सर्वगी सब में बोले, 

जड़ चेतन जग सारी।।7।।


धर विश्‍वास सांच संग सिद्धा 

सन्‍त अनन्‍त विचारी।

सो विश्‍वास फल अब लिखमा जाणे, 

जीस्‍यो हरि त्‍यारी।।8।।

जागता पीर जोतधारी, रामा श्‍याम सिफत क्‍या कहुं थारी jagta peer jot dhari shyam sifat kya kahu thari

 




जागता पीर जोतधारी, रामा श्‍याम सिफत क्‍या कहुं थारी।।टैर।।


निकलंक रूप रम्‍या रूणीचे, 

निर्भय थको कलाधारी।

पिछम भोम में भला प्रगटिया, 

अजमल रे घर अवतारी।।१।।


घर तंवरा रे कंवर केवाया, 

रामदे थे देहा थारी ।

परदे हुवा जद पीर केवाणा, 

इष्‍ट इडक आसत धारी।।२।।


कर कर भाव पांव पीरा रे, 

आवे वर्ण छतिसो सब सारी ।

महिमा घणी  धणी ने ध्‍यावे, 

उबारी आसापुरी अजमतधारी।।३।।


कीरत कंवर करे संत केता, 

ओड़ग करे अनन्‍त थारी ।

ध्‍यायो जको मिले धन रोजी, 

गायां मान बंधे भारी ।।४।।


नव निज पीर पुरूष दशवे थे, 

कलयुग भली कला सारी।

शरणे आवो साध रहे सोरा, 

पूज्‍या पाप कटे भारी ।।५।।


दुनिया दार विचार नजाण्‍यो, 

अलख अलभ थारी गम न्‍यारी ।

लिखमी कहे कि जाण थारी क्रिया, 

आयो शरण थको थारी।।६।। 

राम रामदे तू रहमान पार ब्रह्म थारा करू बखाण ram ramde tu rahman paar brahm thara karu bakhan


 

राम रामदे तू रहमान, पार ब्रह्म थारा करू बखाण।।टेर।।


सारद सिंवरू सुद बुद बाण 

गणपत स्‍वामी करू बखाण ।

कीरत करू कंवर थारी जाण, 

हृदय बख्‍सो इवरल बाण ।।१।।


नरसिंह रूप अवतरया आण, 

हाथर पटकी हांकरे पाण।

प्रहलाद भगत री प्रीत पिछाण, 

हरणाकुश रो मार्यो माण ।।२।।


जमन रिषि घर अवतरया आण, 

परशुराम प्रकट पावाण।

लिनो बैर पिता रो जाण, 

राक्षस मार्यो फरसे रे पांण।।३।।


दशर‍थ घर अवतरया आण, 

पाणी पर तारया पाखाण।

लंका लीवी आपरे पांण, 

दीनाेे राज विभिषण जाण ।।४।।


मथुरा में अवतरया आण, 

कृष्‍ण कला रमियो बहुत जाण।

मारयो कंश फेर दीवी आन, 

नही करती कृता री काण।।५।।


कर गिरवर धोर्यो पाखाण, 

इन्‍द्र अभिमान मेटियो जाण।

द्वारका मे अवतरया दीवान, 

जद रणछोड़ बाजियो आण।।६।।


अजमल घर अवतरया आण, 

कुमकुम कदमों पड़ी पछाण ।

मारयो देत दुनिया दुख जाण, 

उण खांवद राए एनांण।।७।।


बोपारी वचना रे पांण, 

डूब्‍या उपर कृपा कर आण।

पड़ते पासे करी पिछाण, 

साहूकार ने तारयो जाण।।८।।


दातादेव अरू दुनिया दिवान, 

रब ज्‍यूं राज तपो रहमान।

लिखमा कहे लखो हरि बाण, 

दुरमत मेट एककर जाण।।९।। 

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