भरोसे आपके चाले ओ सतगुरू म्‍हारी नांव bharose aapke chale satguru mari naav bhajan lyrics

 भरोसे आपके चाले ओ,

सतगुरू म्‍हारी नांव।

सतगुरू म्‍हारी नांव बापजी,

धिनगुरू म्‍हारी नांव।।टेर।।

 

नहीं है म्‍हारे कुटुम्‍ब कबीलो,

नहीं म्‍हारे परिवार।

आप बिना दूजो नहीं दीखे,

जग में पालनहार।।1।।

 

भवसागर ऊण्‍डो गणो ने,

तिरूं न उतरूं पार।

नगे करूं तो नजर न आवे,

भवसागर की धार।।2।।

 

सतगुरू रूपी जहाज बणालो,

इण विध उतरो पार।

सुरत चाटलो ज्ञान बांचलो,

खेवट सिरजनहार।।3।।

 

कहे कबीर सुणो भाई साधू,

इण विध उतरो पार।

रामानन्‍द मिल्‍या गुरू पूरा,

बेड़ा कर दिया पार।।4।।




गणपत देव बड़ा मतवाला Ganpat dev bada matwala bhajan lyrics

आदुु अन्त करूं थांकी सिवरणा,
जुंगा-जुंगा थारी करा सिवरणा।
मारा खोलो गिगन घर ताला,
गणपत देव बड़ा मतवाला।।टेर।।


आपने सिंवरिया अगम की सुझे,
सुद्ध बुद्ध देबा वाला।
शंकर जी का लाल कुवाया,
पारवती जी का बाला।।1।।

प्रथम नमन करूं आपने,
काटो करमां का जाला।
सिर पर हाथ धरो मेरे दाता,
रिद्धि सिद्धि देबा वाला।।2।।

चार जूगां में अगम पुजाया,
जागिया गुरूजी का बाला ।
जाणिया जो तो करणी करग्या,
जाके घट में होग्या ऊजाला।।3।।

पदमगुरू परवाणी मिलिया,
लाडूरामजी का बाला।
गुर्जर गरीबीऊ कनीरामजी बोले,
गांव गोरख्या वाला।।4।।




फूल्‍या की बई मरगी पंचा ने लाडू भावे fulya ki bai margi pancha ne laadu bhave

फूल्‍या की बई मरगी, पंचा ने लाडू भावे।

पंचा ने लाडू भावे, पंचा ने अमला भावे।


बिमारी में बाबा व्‍हेग्‍या,

नोट कठा सूं आवे।  

आखिर बई को जीव नीरग्‍यो,

जद्या दूनो घबरावे।।1।।


धबड़ धबड़ तो बई बले,

और नाई राच ले आवे।

घटे जो तो जामत कर दे,

चोटी ने राम बचावे।।2।।


आस पास का गॉंवां का,

जो सुणे बैठबा आवे।

बीड़ी जेब मूं काढ़े कोईने,

धामा में नजर गुमावे।।3।।


वां के मरग्‍या वां के मरग्‍या,

कह कह मन गणो समझावे।

ऊबा गेहवां ने गेने मांड के,

शक्‍कर की बोरिया लावे।।4।।


पांच पकवान बणा,

पछे जीमबा आवे।

खेत कूड़ा गेने मंडग्‍या,

तोई खेते मेलबा जावे।।5।।


मृत्‍युभोज ने बंद करो,

मौको फेर नहीं आवे।

इ पदकई में कई धरियो,

यो ऊंकारो सही बतावे।।6।।




बाबूजी मेरा टिकिट क्यो लेता babuji mera tikat kyu leta


मारो खर्चा मालिक पूरे,
मैं वाका नाम पे रेता।
बाबूजी मेरा टिकिट क्यो लेता,
मेरा टिकिट क्यो लेता । ।

तीन गुणा का डिब्बा बणाया,
मन का इंजन जोता।
काम क्रोध रा फुक्‍या कोयला,
अणि में चेतन सिटी देता ।।1।।

तीर्थवासी आया रेल में,
आवागमन में रेता।
होय निरंजन फिरा जगत में,
कोड़ी पास नहीं रखता ।।2।।

राता पिला सिग्नल बनाया,
सोहंग तार खिंचता।
अला अलद का लीना आसरा,
ऐसी लेन जमता।।3।।

निर्भय होकर आया जगत में,
दाम पास नहीं रखता।
माया की नही बांधा गाँठड़ी,
मैं तो वह वनियारा में रेता ।।4।।

अमरापुर से चिट्ठी उतरी, 
हेला पाड कर देता। 
गुर्जर गरीबीऊ कनीरामजी बोले,
अमर पास कर लेता ।।5।।



पंछीड़ा लाल आछी पढियो रे उल्‍टी पाटी panchida laal achi padiyo re ulti pati

 पंछीड़ा लाल आछी पढियो रे उल्‍टी पाटी।।टेर।।


गंगा न्‍हाय गौमती न्‍हायो,

न्‍हायो तीरथ साठी।

झुठ जाल झपट नहीं छोड़ी,

राखे मन में ऑंटी।।1।।


औरत ने छन्‍याल बतावे,

मारे लेकर लाठी।

कीड़ान्‍दा गंडक ज्‍यूं दौड़े,

दे गलिया में चांटी।।2।।


अइल्‍या भइल्‍या ने नूते नत,

जीमें साथी रोटी।

बुढ़ा मायत बिलखे वां नेे देवे ना,

बली बाटी।।3।।


आछी अकल सीख्‍यो कूका,

भणग्‍यो बारा पाटी।

ऊबो ऊबो मूते ढांडा,

खोल पेन्‍ट की टाटी।।4।।


अरे डोलमा डील बणायो,

खाय खाय ने माटी।

अपणां जीबा खातर थू,

कतरा की गर्दन काटी।।5।।


ओरा ने तो गेलो बतावे,

खुद चाले सेपट पाटी।

केवे ओर करे थू ओरी,

चले चाल थू रांटी।।6।।


करले भैरया मन भोलो,

पण लख चौरासी घाटी।

आगे जमड़ा पाड़सी,

दे मुंडा के डाटी।।7।।




आज ही करले जो करना है कल का aaj hi karle jo karna he kal ka

आज ही करले जो करना है कल का,
कल कल क्‍या करता नहीं भरोसा पल का ।।टेर।।

रावण सोचा सिड्या स्‍वर्ग पहुंचाऊ,
अग्‍नि की जाल मूं धुआं ने बन्‍द कराऊ।
फिर कंचन सोना माय सुगन्‍ध मिलाऊ,
लंका नगरी में ला बैकुण्‍ठ बसाऊ।
करू करू में छोड़ गया वो खल का।।1।।

जग झूठा है जंजाल, सपन ज्‍यूं माया,
या है कांटा की झाड़, जाण उलझाया।
धन जोबन मेहमान, बादल ज्‍यूं छाया,
झट  जाग मुसाफिर, पंथ भूल भटकाया।
अब आथण में भाण,रहिया कुछ चलका।।2।।

पाणी का बरबड़ा ज्‍याण फटक फूट जाये,
बणजारा थारी बाळद कद लुट जाये।
या चलती गाड़ी कदपंचर हो जाये,
ये गया स्‍वांस भीतर आये न आये।
गणती रा रेग्‍या स्‍वांस,मैल धो दिन का।।3।।

पाणी का रेला ज्याण जीवण यो जावे,
क्‍या सोया सुखभर नींद, बींद सर छाये
यो मनखा तन मेहमान फेर नहीं आये,
माटी की पुतली माटी में मिल जाये।
मत भूले भैरया मौत पाप कुछ मल्‍का।।4।।



रामजी रा घर में नाही कणी बात रो घाटो Ramji ra ghar me nahi kani baat ro gato

रामजी रा घर में नाही,

कणी बात रो घाटो।

पण यो कर्मा के अनुसार,

सबा रे कर दीनो बांटो।।टेर।।


कोई भोगे महल मालिया,

कोई ऊंची मेड्या।

कोई भोगे मोटी पोल्‍यांं,

चांदण चौक गवाड्या।

कोई झोपडिया टापरियां,

छायो घास रो टाटो,पण...।।1।।


कोई जीमे माल मलीदा,

कोई खीर खीचड़लो।

कोई भारी मेहनत करता,

खावे घाट छाछड़लो।

कोई भूखो ही भरलावे,

पेट के बांधे पाटो, पण...।।2।।


कोई राजा कोई रंक राव है,

कोई सेठ साहूकारी।

कोई दुख्‍यारो घर घर मांही,

मांगत भीख भिखारी।

यो है पाप पुण्‍य को लेखो,

लागो जीवां रे छांटो, पण...।।3।।


कोई मूर्ख पण्डित है, कोई बेण्‍डो,

कोई सन्‍त सुर ज्ञानी।

कोई राण्‍ड्यो कोई शेर सूरमो,

कोई दाता कोई दानी।

भैरया देख देख मत छीजे,

यो है कर्मा को फांटो,पण...।।4।।

होली खेल ले पंछीड़ा लाल फागण का दन चार holi khel le panchida laal fagan ka dan char

होली खेल ले पंछीड़ा लाल,

फागण का दन चार।।टेर।।


काया नगर ब्रज मण्‍डल का ले,

गोप गोपिका लार रे।

ब्रह्म रूप कानूड़ो राधा,

जाण आत्‍मा नार, होली...।।1।।


गम का गेरया ढोल घुरावे,

चित चांक डपतार रे।

गुरां ग्‍यान की उड़े गुलालां,

अनहद की रणकार, होली...।।2।।


करम कड़ावा माही घोल ले,

सत संगत रंग डार रे।

परा प्रेम की भर पिचकारी,

डोलचियां फटकार, होली...।।3।।


चंद में सूर, सूर में चंदा,

सुरत सुखमणा सार रे।

कुमत होली में बाल,

सुमत मन प्रहलाद ने तार, होली...।।4।।


फागण का ये बाव छूूट्या्,

पाका पान डार रे।

चेत लागवा वाळो भैरया,

जाय जमारो हार,होली...।।5।।

गणपति थाने मनाया माने सुद बुद आवे छ ganpati thane manaya mane sudh budh aave cha



गणपति थाने मनाया,

माने सुद बुद आवे छ।

भूली विद्या रा सुमरण,

गणपति देव करावे छ।।टेर।।


माता गवरी शंकर का,

गणपति पुत्र कहावे छ।

मोटा मन्‍दर तुम्‍हारा,

दुनिया दरसण पावे छ।।१।।


सावण अन्तिम रविवारो,

थारो मेलो आवे छ।

दुनिया आवे परसादी लावे,

भेंट चढ़ावे छ।।२।।


राजा परजा बोपारी वो थाने,

सदा मनावे छ। 

मंगलकारी कामां में थाने,

नूत बुलावे छ।।३।।


बिगड्या कारज होवे तो,

कृपा कर सुलझावे छ।

बल बुद्धि विद्या वरदायक,

विघन नसावे छ।।४।।


कल्‍याण भारती सतगरू ,

गणपति का रूप लखावे छ।

गणपति महिमा सतसंग में,

सेवा भारती गावे छ।।५।।


हंसा निकल गया काया से खाली पड़ी रहे तस्‍वीर hansa nikal gayo kaya se khali padi rahe tasveer

दोहा: राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट।

अन्‍त काल पछतायेगा, जब प्राण जायेगा छूट।।

 

हंसा निकल गया काया से,

खाली पड़ी रहे तस्‍वीर।।टेर।।

 

जम के दूत लेने आवे,

नेक धरे नहीं धीर।

मार मार कर प्राण निकाले,

ढरे नयन से नीर।।1।।

 

बहुत मनाये देवी देवता,

कोई बहुत मनाये पीर।

अन्‍त समय कोई काम न आवे,

जाणा पड़े आखिर।।2।।

 

कोई नहलावे कोई धुलावे,

कोई ओढ़ावे चीर।

चार जणा मिल मतो उपायो,

ले गये जमना / मरगट तीर।।3।।

 

माल मुलक की कोन चलावे,

संग नहीं चले रे शरीर।

जाय जंगल में चिता चुणाई,

कह गये दास कबीर।।4।। 



सांवरिया मारो सागर भर दे रे बरखा कर दे रे sanwariya maro sagar bhar de re barkha kar de re

 सांवरिया मारो सागर भर दे रे,

बरखा कर दे रे।।टेर।।

 

बरस्‍या बिना गांया भास्‍या सगली,

मालवे जासी रे।

छोटा मोटा बाछडिया,

गेला में  रुलग्‍या रे।।1।।

 

बरस्‍या बिना सगा गनायत,

मुखड़े कोनी बोले रे।

सुल्‍टो केवो न,

उल्‍टो जावे रे।।2।।

 

बरस्‍या बिना भाण्‍या महाजन,

कोनी तोले रे।

बेटी हाट,

धुरकारा देवे रे।।3।।

 

बरस्‍या बिना वकील बालेसर,

हे सगला संग साथी रे।

अन्‍त समय कोई,

काम न आसी रे।।4।।

 

बरसण लागो इन्‍दर राजा,

सगला खुशी मनावो रे।

जोधाणा रो जाट रूपजी,

सपनो गायो रे।।5।।

जब जब भीड़ पड़ी भगता में आप लियो अवतार jab bhid padi bhagta me aap liyo avatar

 

जब जब भीड़ पड़ी भगता में,

आप लियो अवतार।

सांवरिया की लीला ऐसी है अपरम्‍पार।।टेर।।

 

जी सायब ने सृष्टि रचाई,

वो सायब सब के माई।

एक पलक में खलक रचाया,

उनका कोई अतबार नहीं।

 

आपू थापे आपू ही उथापे,

ओरां की माने नाही।

बेमुख होकर अरजी करता,

वा अरजी सुणता नाही।

 

अरजी के ऊपर मालिक रहता,

अपने आप आधार।।1।।

 

नेम करे कोई धरम करे,

कोई तीरथ को जाता भाई।

तरह तरह की देख मूरता,

अकल कियो माने नाही।

 

जल पत्‍थर की है सब पूजा,

और देव दरसे नाही।

मनोकामना पूरण करता,

ऐसा है समरथ सांई।

 

जड़ चेतन में बाहर भीतर,

व्‍याप रिया एक सार।।2।।

 

ज्ञान करे कोई ध्‍यान करे,

कोई उलटा पवन चलाता है।

दस इद्रियो का दमन करके,

प्राणों में प्राण मिलाता है।

 

खेचर बूचर अगम अगोचर,

कोई उनमुन को धाता है।

चांद सूरज का साज सरोदा,

एकण घर में लाता है।

 

पड़ा पड़ा कोई खड़ा खड़ा,

कोई हरदम रेहवे होशियार।।3।।

 

पांचों इन्‍द्री पांचों प्राण,

वांके बन्‍ध लगाता है।

मुनि होकर मुख नहीं बोले,

सेनी में समझाता है।

 

गड जाता कोई उड़ जाता,

कोई अगनी में जल जाता है।

हजार बरस की देहि राख लेवे,

तो ही  भेद नहीं पाता है।

 

आठ पहर चौसठ घड़ी में,

लाग रियो एक ही तार।।4।।

 

जोगी होकर जटा बढ़ावे,

पगा अबाणा चलता है।

षटरस भोजन हरदम जीमे,

लुका भोजन नहीं खाता है।

 

शिष्‍य उनका कहना नहीं माने,

बुरी तरह चिल्‍लाता है।

बूढ़ा हिया जद रोग सताता,

पड़ा पड़ा दु:ख पाता है।

 

पाखण्‍डी परला में जावे,

जदी लेवे अवतार।।5।।

 

ज्ञान ध्‍यान मैं कुछ नहीं जाणू,

संत की सेवा करता भाई।

आप जुगत मुगत के दाता,

उबार लो चरणां माई।

 

तीन लोक में हुकम आपका,

और पता हिलता नाही।

आप बिना कुण सुणता मेरी,

और देव दरसे नाही।

 

आदूदास की या ही वीणती,

बेड़ा लगा दीज्‍यो पार।।6।।




करलो चरण कमल का ध्‍यान ज्ञान गरू गम से पाया है karlo charan kamal ka dhyan gyan guru gam se paya hai

 

करलो चरण कमल का ध्‍यान,

ज्ञान गरू गम से पाया है।।टेर।।

 

ऐसा सतगरू शब्‍द सुणाया,

तन मन तरपत कर दी काया।

समझा कर सूता जीव जगाया,

मन का दुतिया भाव मिटाया।

गरू जगत को तारण आया है।।1।।

 

सुरता सिमरण में धुन लागी,

नागण नाभ कंवल में जागी।

वो तो बड़ा बड़ा ने खा गी,

उनको मारे कोई संत बड़भागी।

पवन नाभी पलटाया है।।2।।

 

उतर्या तरबिणी की घाटी,

तां पर त्रिगुण त्राप मिटादी।

भंवरा त्रकुटी में डारी,

पुरूष को दर्शण पायो।

समाधी ज्ञान लगाया है।।3।।

 

वहां से अमृत धारा छूटी,

वस्‍तु मोल अमोलक लूटी।

वामे फरक रती नहीं झूठी,

पुरूष अमर केवायो है।।4।।

 

वहां नहीं चांद सूरज दिन राती,

जल रही अखण्‍ड जोत बिन बाती।

कर रही पिया से वो बाती,

अखण्‍ड जोत प्रकाशी।

सुरता नुरता नाच नचाया है।।5।।

 

गोविन्‍दराम बलिहारी,

मनसा पूरण करदी मारी।

आदूदास सुमरण में धुन लागी,

निरभे सुख सागर न्‍हाया है।।6।।

राजपाट तज बण गयो जोगी या कई दिल में धारी rajpat taj ban gayo jogi ya kai dil me dhari

 

राजा भरतरी से अरज करे,

महलों में खड़ी खड़ी राणी।

राजपाट तज बण गयो जोगी,

या कई दिल में धारी।।टेर।।

 

नगर उजिणी को राजा भरतरी,

हो घोड़े असवारी।

एक दिन राजा दूर जंगल में,

खेलण गया रे शिकारी।।1।।

 

बिछड़ गये मोरे रंग के साथी,

राजा भया रे लाचारी।

किस्‍मत ने जब करवट बदली,

छूट गया घरबारी।

होणहार टाली न टले,

समझे न दुनिया सारी।।1।।

 

काला सा एक मृग देखकर,

तीर बाण कर मारा।

तीर कलेजे तीर लगा जब,

मृगा ने हा हा पुकारा।

 

व्‍याकुल होकर हरणी बोली,

हे पापी हत्‍यारा।

मृगा के साथ सती मैं होऊंगी,

ऐसे नाथ पुकारा।

रो रो कर फरियाद करे,

घबराए राजा ज्ञानी।।2।।

 

राजा जंगल में रूदन करे,

गुरू गोरखनाथ पधारे।

मृगा को जान देकर तपसी,

राजा का जन्‍म सुधारे।

 

उसी समय राजा ने अपने,

राजसी वस्‍त्र उतारे।

गुरू मंत्र से बण गया जोगी,

अंग भभूती रमाई।

घर घर अलख जगाता फरे,

बोले मधुर बाणी।।3।।

 

गुरू गोरख री आज्ञा भरतरी,

महलूं में अलख जगाता।

भर मोतियन की थाल लाई,

दासी लेलो जोगी जुगदाता।

 

माणक मोती क्‍यो लाई दासी,

चून की छमटी लाता।

भिक्षा लूंगा जब जोली में,

आयेगी राणी और माता।

राणी के नैणो में नीर भरा,

पिया जी की सुरता पछाणी।।4।।

 

हे निरमोही दया न आई,

छोड़ चल्‍या रजधानी।

मैं समझा रही तोहे पियाजी,

मेरी एक न मानी।

 

बाली ऊमर नादान नाथ मेरी,

कैसे कटे जिन्‍दगानी।

भेस छोड़ कर राज करो राजा,

यूं बोले प्रेम की बाणी।

अन्न धन का भण्‍डार भरा है,

खूब करू मजमानी।।5।।

 

तमक चाल की भोली दुनिया,

जैसे बहता पाणी।

अमर नाम मालिक का रहेगा,

थोड़ा समझ अज्ञानी।

 

भजन करो भव सिन्‍धु तरो,

कट जावे लख चौरासी।

नत नई रंगत गावे महादेवजी,

फेर जनम नहीं पासी।

हरि का भजन करता रहे,

प्राणी दो दिन की जिन्‍दगानी।।6।।




कूड़ा बोले ज्‍यारो कई पतियारो रे kuda bole jyaro kai patiyaro re

 

कूड़ा बोले ज्‍यारो कई पतियारो रे।।टेर।।

 

नट गयो तेल बुझ गयो दिवलो,

मंदर में भयो घोर अंधारो रे।।1।।

 

ढस गई नींव उखड़ गई टाटी।

माटी में मिल गयो गारो रे।।2।।

 

थू तो केतो थारे संग चालस्‍यू,

आखिर हो गयो न्‍यारो रे।।3।।

 

लेय कटोरो शहर में चाल्‍यो,

नहीं मिल्‍यो तेल उधारो रे।।4।।

 

लद गियो ढाड़ो उठ गयो बणजारो,

जातो कियो ललकारो रे।।5।।

 

कह कबीर सुणो भाई साधू,

उठ चल्‍यो साहूकारो रे।।6।।




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