गांव करेड़ा में जांवा ला कालाजी का दरसण पावांला ganv kareda me javala Kalaji ka darsan pavala

गांव करेड़ा में जांवा ला,

कालाजी का दरसण पावांला।टेर।।

 

छालर मोगर गाय कालाजी के नाम की।

जावणी चढ़ाबा ने जांवाला,कालाजी...।।1।।

 

एक तो बालूड़ो कालाजी के नाम को।

पालणो बंदाबा ने जांवाला,कालाजी...।।2।।

 

एक तो रातीजगो कालाजी के नाम को।

रात जगाबा ने जांवाला,कालाजी...।।3।।

 

एक तो धोक वा कालाजी के नाम की।

जोड़ा की धोक दरावाला,कालाजी...।।4।।

 

एक तो गोल वा कालाजी के नाम की।

गोल पहराबा ने जांवाला,कालाजी...।।5।।

 

गुजर गरीबो कनीराम बोले।

चरणां में धोक लगावांला।।6।।


नर थोड़ो चेनत हाल मारगिया में भो भारी nar thodo chetan haal margiya me bho bhari

 

नर थोड़ो चेनत हाल मारगिया में भो भारी।।टेर।।

 

पहला भो भगवान रजक पूरण हारी।

मत कर माया को अभेमान पलक में भिख्‍यारी।।1।।

 

दूजा भो गरूदेव जगत तारण हारी।

धर्या शीश पर हाथ नकलंग करी देह थारी।।2।।।

 

तीजो भो संसार रहणा मणधारी।

चाले संत की चाल परमल फूटे थारी।।3।।

 

चौथा भो है काल दन में आवे तीन बाली।

रटजो श्‍वांस म श्‍वांस राम और रुणकारी।।4।।

 

मोह का भरिया कूप डूब रिया नर नारी।

कहे हीरोजी भव थाग हो जावो भव पारी।।5।।

माया माण गणा नर तरिया करोड़ा में शाखा भराले maya maan gana nar tariya karoda me sakha bharale

 

माया माण गणा नर तरिया,

करोड़ा में शाखा भराले,

मन थू माया माण मजा ले।।टेर।।

 

कन्‍चन माया बांटो भाया,

दान पुन्‍न में लगाले।

खरच्‍या पछे होवे सवाई,

आगे की खरच्‍या बणाले।।1।।

 

खेती भावो वो फल पावो,

पांती तीन कराले।

खुद खाबा ने श्रीजी पूरे,

श्री को शीर चुकादे।।2।।

 

कामण माया आंगण सोहवे,

नीती नेम नमाले।

आया साध की साजो बन्‍दगी,

भोजन भाव जिमा दे।।3।।

 

झीणी माया बांटो भाया,

मन का मजा उड़ा ले।

बांटो तो गरू बचनाऊ बांटो,

गुरा की शाखा दराले।।4।।

 

माया माण नर तरिया,

अजपा का जाप जपाले।

कहे हीराराम गुरा को,

गुरूमुखी ज्ञानी कुवाले।।5।।

मारी नैया ने पार लगावो रे सांवरा गिरधारी mari naiya ne paar lagao sanwara girdhari

 

मारी नैया ने पार लगावो रे,

सांवरा गिरधारी।।टेर।।

 

खम्‍म फाड़ प्रहलाद बचायो,

हिरणाकुश ने मारा रे।।1।।

 

द्रोपदी का चीर बढ़ाया।

राम नाम गुण गाया रे।।2।।

 

मीराबाई ने प्रभु तेरा गुण गाया।

जहर का अमृत बणाया रे।।3।।

 

नरसी भगत ने तेरा गुण गाया।

नानीबाई ने मायरो पहरायो रे।।4।।

 

करमाबाई ने तेरा गुण गाया।

रुच रुच भोग लगाया रे।।5।।

 

मीरां दासी जनम जनम की,

चरण कमल में राखो सांवरा।।6।।

भाई रे मत दीजे मावड़ली ने दोष करमा की रेखा न्‍यारी न्‍यारी bhai re mat dije mavadali ne dosh karma ki rekha nyari nyari

भाई रे मत दीजे मावड़ली ने दोष,

करमा की रेखा न्‍यारी न्‍यारी।।टेर।।

 

एक मायड़ के बेटा चार,

चारां की करणी न्‍यारी न्‍यारी।

पहलो राजाजी रे दरबार,

दूजोड़ो हीरा पारखी।

तीजो बणजारा री हाट,

चोथोड़ो फेर पुणीया।।1।।

 

एक माटी का बरतन चार,

चारां की करणी न्‍यारी न्‍यारी।

पहले में दहीयो बलोय,

दूजो मसाणे चालियो।

तीजो पणिहार्या रे शीश,

चोथोड़ो मीदन बाडियो।।2।।

 

एक गऊ के बछड़ा चार,

चारां की करणी न्‍यारी न्‍यारी।

पहलो सूरज जी रो सांड,

दूजोड़ो शिव रो नान्‍दीयो।

तीजो घाणी वालो बैल,

चोथो बिणजारो लादियो।।3।।

 

एक बैलड़ के तूम्‍बा चार,

चारां की करणी न्‍यारी न्‍यारी।

पहलो पहलो सतगरू जी रे द्वार,

दूजोड़ो जल जमना भर्यो।

तीजो तन्‍दूरा री बीण,

चोथोड़ो भीक्षा मांगरियो।।

 

कह गया दास कबीर,

करमा का भारा मेट दो।।4।।

बेटा श्रवण पाणीड़ो पिलाय बन में बेटा प्‍यास लगी beta shravan panido pilay ban me beta pyas lagi

बेटा श्रवण पाणीड़ो पिलाय,

बन में बेटा प्‍यास लगी।।टेर।।

 

आला नीला बांस कटाया,

कावड़ लई रे बणाय।

मात पिता बेठा कावड़ में,

तीरथ करबा जाय।।1।।

 

कावड़ लेकर सरवण चाल्‍यो,

बिकट बनी के माय।

हरिया पेड़ कदम्‍ब के नीचे,

कावड़ दीनी रे उतार।।2।।

 

ना कुआ ना बावड़ी रे,

ना कोई समन्‍द तलाब।

बिकट बनी में प्‍यास लगी रे,

भली करी भगवान।।3।।

 

हरिया पेड़ कदम्‍ब के ऊपर,

बगला उड़ उड़ जाय।

श्रवण मां से केवण लागो,

अब जल लाऊ मारी माय।।4।।

 

झारी लेकर श्रवण चाल्‍यो,

गयो नदी के तीर।

धोय झकोल जल भरबा लागो,

दशरथ मार्यो तीर।।5।।

 

लागो तीर पड्यो धरती पर,

राम नाम मुख लाय।

दशरथ मन में सोचे रे,

यो कोई भगत सताय।।6।।

 

मरतो मरतो श्रवण बोल्‍यो,

सुण राजा मारी बात।

मात पिता है प्‍यासा मारा,

जल तो दीजे रे पिलाय।।7।।

 

झारी लेकर दशरथ चाल्‍यो,

मात पिता के पास।

धीरे धीरे बोलण लागो,

अब जल पीवो मारी मात।।8।।

 

ना श्रवण की बोली लाला,

ना श्रवण की चाल।

श्रवण मारो पाणी लावे,

थे तो पराया दीखो पूत।।9।।

 

अवधपुरी को राजवी जी,

दशरथ मारो नाम।

लाग्‍यो तीर जोर को मारो,

श्रवण गयो स्‍वर्ग सिधार।।10।।

 

थू हत्‍यारो श्रवण को रे,

माने मत बतलाय।

ज्‍यू श्रवण बिन मैं मरा रे,

थू भी यू ही मर जाय।।11।।

 

मात पिता तो स्‍वर्ग सिधार्या,

कहग्‍या सांची बात।

तुलसीदास भजो भगवाना,

दशरथ ने लागो श्राप।।12।।

साधू भाई सिमरण की गत न्‍यारी sadhu bhai simran ki gat nyari

दोहा:- रात को भजे जो चोरड़ा और दिन को भजे जो ढोर।

गुफा में भजे जो उन्‍दरा तो सिमरण की गत और।।

 

साधू भाई सिमरण की गत न्‍यारी,

करते है सिमरण सन्‍त सन्‍यासी,

वांको है बलिहारी।।टेर।।

 

श्‍वास श्‍वास में सोहं बोले,

घट अन्‍दर धुन धारी।

मन सुरता लागी रहे उनमें,

आठ पहर इकसारी।।1।।

 

आसण अधर रहत अणी ऊपर,

नंगे करत निहारी।

इला पिंगला सहजे पलटी,

सुखमण खुली किवाड़ी।।2।।

 

कुदरत खेल अजब रंग देखा,

झिलमिल जोत जगारी।

अनहद बाजा बाजे गगन घर,

तन की सुध बिसारी।।3।।

 

अमरत जरणा जरत सदा ही,

सतगरू के दरबारी।

मंगल मूरत दरश दिखाया,

गणपत नत बलिहारी।।4।।

रंग रंग का फूल खिल्‍या है देखो राम बाग गुल क्‍यारी rang rang ka phool khilya Ram baag kyari

 

रंग रंग का फूल खिल्‍या है,

देखो राम बाग गुल क्‍यारी।।टेर।।

 

तख्‍ता चार चौरासी क्‍यारी,

ज्‍यांकी सड़का न्‍यारी न्‍यारी।

पेड़ से पेड़ बड़े है।।1।।

 

कुआ एक बाग के माही,

धोरा तीन लग्‍या है वांही।

कुआ से बाग पीवे है।।2।।

 

मालण एक बागा के माही,

भर धोबो फूला को लाई।

मुख आगे लाय धरे है।।3।।

 

बैठी मालण माला पोई,

दिल चाहवे ले जावो कोई।

देवा के शीश चढ़े है।।4।।

 

रामानन्‍दजी माला दीनी,

दास कबीरा प्रेम कर लीनी।

घट बिच माला फिरे है।।5।।

अब थू ले सतगरू की शरण तरण को ओसर आयो रे ab tu le satguru ki sharan taran ko osar aayo re

अब थू ले सतगरू की शरण,

तरण को ओसर आयो रे ।।टेर।।

 

शुभ करमा से मनख तन पायो,

हरख शोक कबहू नहीं लायो।

बणकर आयो बीन्‍द,

नीन्‍द में कैसे सोयो रे।।1।।

 

चोरी चारी और जीव हत्‍या,

मिथ्‍या गाली निन्‍दया बकिया।

हरख शोक अभेमान,

दोष ये दस बतलाया रे।।2।।

 

जो जीव अपनी मुक्ति चावे,

दसो दोष ने दूर हटाले।

पाणी पेली पाल बान्‍ध,

गाफिल कई सूतो रे।।3।।

 

राजा राणा और शिशुपाला,

बाणासुर जरासंध दाणा।

ऐसा ऐसा भूप हिया धरती पर,

पता न पाया रे।।4।।

 

यह दन नर तेरा बीत जायेगा,

फेर चोरासी में जनम पायेगा।

पकड़ सांच तज झूठ,

मारग सीधो बतलायो रे।।5।।

 

रामानन्‍द सत स्‍वामी केवे,

जाग जीव गरू हेला देवे।

कहत कबीर विचार,

मनख तन मुश्किल पायो रे।।6।।

मेरी सोई आतमा जागी अंधियारी भरमना भागी meri soi aatma jagi andhiyari bharmana bhagi

मेरी सोई आतमा जागी,

अंधियारी भरमना भागी।

धीरे धीरे राम लव लागी जी,

मेरा भंवरा हुआ बेरागी ।।टेर।।

 

मैने देखा सकल पसारा,

दुनिया से हुआ हूं न्‍यारा।

दुनिया की रीत सब देखी,

प्रीत मारी मोह माया ने त्‍यागी ।।1।।

 

कोई पांच तत्‍व ने गावे,

कोई त्रिकुटी नाथ तनावे।

रेशम की राख हो गई खाक,

मेरी रोम रोम लव लागी ।।2।।

 

किया ऐसा जादू टोना,

आज माटी बनाया सोना।

कहत कबीर गावे,

प्रभु भजन बिना नहीं पावे ।।3।।

बैठ सभा के बीच भेद बतलादे सतसंगी beth sabha ke bich bhed batlade satsangi

बैठ सभा के बीच,

भेद बतलादे सतसंगी ।।टेर।।

 

नया शहर से चला अचम्‍भा,

पांच बण्‍या पारस का थम्‍मा।

आठ गांव बत्‍तीस मोहल्‍ला,

बच में है खण्‍डी ।।1।।

 

बिन धरणी इक बाग लगाया,

बिन माली सींचण को आया।

अणी बाग की अजब सैल है,

फूल लाल डण्‍डी ।।2।।

 

अणी शहर का राजा भारी,

कोण पुरूष इमे कुण है नारी।

पांच पखावज तीन तबलची,

नाच रही रण्‍डी ।।3।।

 

इसी भजन का अर्थ बतावो,

साज बाज यांही धर जावो।

कहत कबीर सुणो भाई साधू,

हट जा पाखण्‍डी ।।4।।

अनहद का यह खेल काइक नर पाता है anahad ka yah khel koik nar pata hai

 

अनहद का यह खेल,

काइक नर पाता है।।टेर।।

 

एक बीट फूल चार लगाया,

पान फूल अति पेड़ न छाया।

पावे बिरला संत,

अगम घर जाता है।।1।।

 

शील सुन्‍दर भरा है वहां पर,

नहावेगा कोई हरिजन जाकर।

करो गरू से प्रीत,

सीख लग पाता है।।2।।

 

अन्‍धा बहरा लूला लंगा,

कोई न कोई करता धन्‍गा।

समझत नहीं गंवार,

मूरख रह जाता है।।3।।

 

रतनपुरी ये समरथ सांई,

निरगुण सार सब दियो बताई।

भजन भेरियो गाय,

अमर पद पाता है।।4।।

देखो रे इण माता धरण पर सांची रचना है जल की dekho re in mata dharan par saanchi rachna he jal ki

देखो रे इण माता धरण पर,

सांची रचना है जल की।।टेर।।

 

बरस पांचवा में इन्‍दर कोप्‍यो,

मेघमाल बरसे हलकी।

ताम्‍बा बरणी धरती तपगी,

घास बिना तो गऊ बिलखी।।1।।

 

बरस छटा में बादल गरज्‍यो,

देख छटा दुनिया हरखी।

खाली समदर छन में भरिया,

लाख करोड़ नदिया खलगी।।2।।

 

जस से घास तुरत जम जावे,

उत्‍पत है सब ही जल की।

जल में हाल शकरवा निपजे,

जल से देही बनी है नर की।।3।।

 

जल बिन दुनिया व्‍याकुल हो रही,

याद रही नहीं है गांवन की।

दु:ख में ताव शीतला दीना,

हो गई ढेरी कंकर की।।4।।

 

जल में जादू राव विराजे,

जल पर थाप थपी थल की।

नन्‍दराम गुण गावे गुरा का,

जल से नींव लगी घर की।।5।।


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