बिन भजन ज्ञान मिले कहो कैसे हिन्‍दू तुरक दो दीन बने bin bhajan gyan mile kaho kese hindu turak do deen

 

बिन भजन ज्ञान मिले कहो कैसे,

हिन्‍दू तुरक दो दीन बने है,

आये एक ही घर से।।टेर।।

 

उनके माला इनके तस्‍बी,

चला करे कर कर से।

बिना गुरू के ज्ञान न पावे,

ध्‍यान धरो चाहे जैसे।।1।।

 

भटक भटक कर घर को आये,

रहेंगे जेसे के तेसे।

वे बकरी व गाय कटावे,

दया रहम नहीं दिल में।।2।।

 

सुन्‍नत कराये मूछा रखाये,

काहे भये गरभे से।

कहे कबीर दोऊ दीन भूला ने,

बेर करे रब रब से।।3।।

गुरू से लगन कठिन है भाई जीव परलय होय जाई guru se lagan kathin hai bhai jeev pralay hoy

 

गुरू से लगन कठिन है भाई,

लगन लगे बिन काम न सरिये,

जीव परलय होय जाई।।टेर।।

 

स्‍वाती बून्‍द को रटे पपीहा,

पिया पिया रट लाई।

प्‍यासे प्राण जात है अब ही,

और नीर नहीं भाई।।1।।

 

तज घर द्वार सती होय निकली,

सत्‍य करण को जाई।

पावक दे डरे नहीं तनिको,

कूद पड़े हरसाई।।2।।

 

दो दल आई जुड़े रण सामे,

सुरा लेत लड़ाई।

टूक टूक होय पड़े धरती पे,

खेत छोड़ नहीं जाई।।3।।

 

मिरगा नाद सबद के भेदी,

सबद सुनन को जाई।

सोई सबद सुण प्राण दान दे,

नेक न मग ही डराई।।4।।

 

छोड़ो अपने तन की आशा,

निर्भय होय गुण गाई।

कहे कबीर सुणो भाई साधो,

नहीं तो जनम नसाई।।5।।

साधू भाई सतगरू सामी झांको सतगरू सेण देवे sadhu bhai satguru sami janko satguru sen deve

साधू भाई सतगरू सामी झांको।

सतगरू सेण देवे समझाकर,

वां बातां ने राखो।।टेर।।

 

सतगरू सेण शब्‍द इक दीना,

समझ समझ कर परखो।

उरद सुरद बिच बास कहिजे,

जीने हेर कर राखो।।1।।

 

माणक कणी दीखे थारा तन में,

ध्‍यान धरे न ज्‍यांको।

गुरा ओलख नहीं पड़सी,

भूण्‍डो हाल होवे थाको।।2।।

 

निरगुण सुमरण बक्‍से सतगुरू,

सूक्ष्‍म सुमिरण राखो।

तिरकुटी और भंवर गुफा में,

ध्‍यान है अखे मण्‍डल को।।3।।

 

गोकलदास कहे सेण गुरू की,

चेलो रामानन्‍द को।

सेण गुरा की लेवे बड़भागी,

चरण कमल चित राखो।।4।।


साधू भाई साधन गुरां से पावे बिना गुरू सेण करे कोइ साधन sadhu bhai sadhan gura se pave bina guru sen kare

 

साधू भाई साधन गुरां से पावे,

बिना गुरू सेण, करे कोइ साधन,

भुगते कष्‍ट दु:ख पावे।।टेर।।

 

चाचरी मुद्रा पहले कीजे,

नेणा की मंजन करावे।

नेणा को ताण भृकुटी संगम,

भूचरी मुद्रा सज जावे।।1।।

 

नाशा आगे दृष्टि ठहरावो,

मुद्रा अगोचर थावे।

दसवे स्‍थान रसना की अणिया,

खेचरी में प्राण लगावे।।2।।

 

अखण्‍ड आसण शक्‍त आत्‍मा,

उनमुन ध्‍यान जामवे

पांचों मुद्रा साजे जो जोगी,

खेचरी में आनन्‍द आवे।।3।।

 

खेचरी मुद्रा साधा की माता,

प्रेम प्‍याला भर पावे।

गोकल दास साधन मुद्रा की,

रामहंस समझावे।।4।।

साधू भाई सेण गुरां से पाया आपो खोज्‍या मिटे आपदा sadhu bhai sen gura se paya aapo khojya mithe aapda

 

साधू भाई सेण गुरां से पाया,

आपो खोज्‍या मिटे आपदा,

आप में आप समाया।।टेर।।

 

पहले आसण साध्‍या से सिद्ध है,

पीछे बन्‍ध लगाया।

पांचों मुद्रा साधन कीजे,

अजपा जाप जपाया।।1।।

 

रेचक पूरक कुम्‍भक करिया,

पान अपान मिलाया।

अपान खेंच प्राण घर लावे,

उल्‍टी मेरू चढ़ाया।।2।।

 

बस कर पवन सुरत तिरकुटी,

निश्‍चय ध्‍यान जमाया।

पहले पहले जगमग जगमग,

पीछे ज्‍योती दरसाया।।3।।

 

खुल गये नाद दसों प्रकारा,

झीणी टेर सुणाया।

हो गया दरस आनन्‍द दास,

गोकल वांही बैठ गुण गाया।।4।।

गुरू सा किण विध फेरू माला मन्दिर में थे मक्‍का भरदी gurusa kin vidh feru mala mandir me the makka bhardi

 

गुरू सा किण विध फेरू माला,

मन्दिर में थे मक्‍का भरदी,

आडा ठोक दिया ताला।।टेर।।

 

चीड़ी कमेड़ी काग कांवलो,

चहुं दिस गाल्‍या आला।

नीव की तरफ नजर भर नरख्‍या,

घूमों का घुड़शाला।।1।।

 

छाती चिपक छिपलिया मूते,

मकडिया दे रही जाला।

साफ सफाई सफेदी कहां वहां,

खड़ा भीतर काला।।2।।

 

देव के नाम देवरा थरप्‍या,

दिल के बीच दिवाला।

धाप्‍यो नहीं रेण दिन धूम्‍यो,

पेरों में पड़ग्‍या छाला।।3।।

 

सुणो नहीं थे श्रवण थाक्‍या,

आंख्‍या फिरग्‍या जाला।

सोचो नहीं थे हिया में हेरो,

हृदय करे उजाला।।4।।

 

कलश पूर कंवली बरतावो,

परदे खोलो नाला।

रामदेव का पंथ सूगला,

भर भर घोथे प्‍याला।।5।।

 

गरूदेव दर्शन नहीं दीना,

घर नहीं दीन दयाला।

रामबक्ष अलमस्‍त दीवाना,

परस्‍या सदर शिवाला।।6।।

अब हम गरूगम आत्‍म चिन्‍हा आऊ न जाऊ मरू न जनमू ab hum gurugam aatm chinha aau na jaau maru nahi janmu

 

अब हम गरूगम आत्‍म चिन्‍हा,

आऊ न जाऊ मरू न जनमू,

ऐसा निश्‍चय कीना।।टेर।।

 

भेख लिया जब सुख दु:ख त्‍यागा,

राम रंग से भीना।

घट घट में सायब सा जाण्‍या,

दुरमती दूरी कीना।।1।।

 

भेख फकीरी सब कोइ लेवे,

ज्ञान फकीरी पद झीणा।

जिणके बाण लगा शब्‍दों सतगुरा का,

शीश उतार धर दीना।।2।।

 

मरजीवा होय जगत में बिसरू,

सवाल करू ना कीन्‍हा।

जिनकी कला सकल में व्‍यापे,

सो सायब लख लीना।।3।।

 

फेरी नहीं फिरू मांग नहीं खाता,

ऐसा निश्‍चय कीना।

अजगर इधर उधर नहीं डोले,

चून हरि लिख दीना।।4।।

 

भक्ति का नैण ज्ञान का दर्पण,

रवि बैराग मिल तीना।

धनसुखराम आतम मुख दरशे,

लखे संत परवीणा।।5।।

मेरा गरू लागे मोही प्‍यारा पल में पार करे भवसागर mera guru lage mohi pyara pal me paar kare bhavsagar

 

मेरा गरू लागे मोही प्‍यारा,

पल में पार करे भवसागर,

है मुझ को इतबारा।।टेर।।

 

आदू धर्म आगली महमा,

सतगरू असंग जुगांरा।

सुर नर देव सभी आरोदे,

अवगत अपरम्‍पारा।।1।।

 

माया मोह का तीन बारणा,

चौथा धर्म द्वारा।

धर्म द्वार मारा सतगरू खोले,

सबकी निमावण हारा।।2।।

 

रेण दिवस का चार समीया,

चालीस बीस से न्‍यारा।

सन्‍ज्‍या मंजानी परा तरकाली,

सोवंग समाधी धारा।।3।।

 

कोइक साधू ओम सिंवरे,

कोइक साई अवतारा।

ओम सोम दोय अक्षर कहिये,

न अक्षर निराकारा।।4।।

 

दौलारामजी मने सतगरू मिलिया,

नाथ जी दिया विचारा।

छोगो लुहार शरण सतगरू की,

जीवत मुक्ति धारा।।5।।

साधू भाई सतगुरू दीन दयाला कटे पाप का झाला sadhu bhai satguru deendayala kate paap ka jala

 

साधू भाई सतगुरू दीन दयाला,

तन मन धन अर्पण गरू आगे,

कटे पाप का झाला।।टेर।।

 

इक्‍कीस हजार छ: सौ मणिया,

ओम सोम टकशाला

हरदम सांस उसांस अजपा,

मन पावन की माला।।1।।

 

इला पिंगला सुखमण में,

चांद सूरज उजियाला।

झिलमिल जोती माणक मोती,

देखे सो मतवाला।।2।।

 

रणण भणण गणण गाजे,

बारा मास बरसाला।

झीणी तार शिखर सूजे,

टूटे तीनू ताला।।3।।

 

गम है माला अगम उजाला,

या परखे गरू का बाला।

रणछाराम मस्‍त माला में,

जनम मरण दु:ख टाला।।4।।

धन गुरा रमज रेल चलाई नो सौ नबज हिलाई dhan gura ramaj rel chalai no so nabaj hilai

 

धन गुरा रमज रेल चलाई,

धन सतगुरू कारीगर बणीया,

नो सौ नबज हिलाई।।टेर।।

 

काम क्रोध का जले कोयला,

अकल इंजन के माही।

पांचों भूप मोरचे अडिया,

गाड़ी ने खूब चलाई।।1।।

 

रजोगुण बाबू फोरमेन कहिये,

सतोगुण गारड थाई।

तमोगुण बाबू टिकट कण्‍डेक्‍टर,

तीनों ही सेण मिलाई।।2।।

 

एक सौ आवठ पच्‍चीस मुसाफिर,

अपना फार्म के मांई।

जैसो किरायो भर्यो टिकट को,

वाही जाय ठहराई।।3।।

 

समझ सिंगल दिया बिना गाड़ी,

आगे जाने नहीं पाई।

श्रवण हार दशो दिसी भळके,

तारू तार सुनाई।।4।।

 

रामहंस गरू पास लिखावे,

अपने फारम माही।

गोकलदास शरण सतगरू की,

कुछ भी धोखा नाही।।5।।

हठ पकड़ो मती नर नार दखणा गरूवर की hath pakdo mati nar naar dakhna garuvar ki

 

हठ पकड़ो मती नर नार,

दखणा गरूवर की।

रेहवो गरू बचन सिर धार,

छाया तरवर की।।टेर।।

 

विश्‍वामित्र के शिष्‍य थे,

गालव जिनका नाव।

गरू दखणा मांगो प्रभु,

पडूं आपके पांव।

मारो जब ही होवे उद्दार,दखणा...।।1।।

 

गुरू बोले गालव सुणो,

कुछ नहीं चाहिये मोय।

घर जावो तुम आपणे,

रहो भजन में खोय।

मारी बात मानो इकबार,दखणा...।।2।।

 

दखणा बिन मोगस नहीं,

सुणो गुरू माराज।

जो मांगो जो देवस्‍यू,

दखणा मांगो आज।

क्‍यूं छोड़ो धरम की धार, दखणा...।।3।।

 

धोला घोड़ा हो आठ सौ,

श्‍याम करण हो रंग।

गरू दखणा में लेवस्‍या,

लावो एक ही संग।

अब मती लगावे बार, दखणा...।।4।।

 

भूख प्‍यास जाती रही,

चिन्‍ता भई अपार।

घोड़े ऐसे दे न सका,

अब मरने को तैयार।

अबे बैठ गियो हिम्‍मत हार, दखणा...।।5।।

 

गालव दु:ख देख के,

गरूड़ आये तत्‍काल।

चारू दिशा फिरते रहे,

प्रतिष्‍ठान पुर जाय।

चले ययाति राजा के दरबार, दखणा...।।6।।

 

श्‍याम करण घोड़ा नही,

धन नहीं अतरो पास।

आया तो नटस्‍यू नहीं,

फिर भी दूंगा साथ।

बेटी माधवी ने कर दू लार, दखणा...।।7।।

 

गरूड़ गालव वहां से चले,

लेय माधवी साथ।

हर्यश्‍व राजा अवधपति से,

जाकर कीनी बात।

दे दो घोड़ा न रख लो नार, दखणा...।।8।।

 

दो सौ घोड़ा पास में,

और न कोई उपाय।

एक पुत्र पेदा किया,

वापस देवो भलाय।

जन्‍मे वसुमना राजकुमार, दखणा...।।9।।

 

काशीपुरी के राजवी,

दीवोदास था नाम।

गरूड़ गालव और माधवी,

पहुंचे उनके धाम।

वो ही बात कही समझार, दखणा...।।10।।

 

दो सौ घोड़ा श्‍याम कर्ण,

यही है मेरे नाथ।

पुत्र एक जनम्‍या पछे,

नारी ले जावो साथ।

हुए प्रतर्दन राजकुमार, दखणा...।।11।।

 

भोज नगर के राजवी,

उसीनर बलवान।

लेय माधवी पहुंच गये,

सुणा दिया फरमान।

राजा मन में कियो विचार, दखणा...।।12।।

 

दो सौ घोड़ा देय कर,

पुत्र पाऊ एक।

और उपाय कुछ भी नहीं,

लिख्‍या विधाता लेख।

शिवि जनम्‍या राजकुमार, दखणा...।।13।।

 

छ: सौ घोड़ा और एक कन्‍या,

ले पहुंचे गरूवर के पास।

और दुनिया में है नहीं,

नहीं किसी की आस।

गरूजी एक पुत्र करो त्‍यार, दखणा...।।14।।

 

गरू कहे इस लड़की को,

पहली लाता पास।

चार पुत्र पैदा किया,

करता खाता साफ।

बेटा अष्‍टक हुआ गरूद्वार, दखणा...।।15।।

 

गरू दखणा पूरी हुई,

पच पच कीदा काम।

बेटी सूपी बाप ने,

हट मत पकड़ो राम।

कहे भेरूदास विचार, दखणा...।।16।।


तर्ज- चेला झूठो कुटम्‍ब परिवार

कहकर जो नट जाय दान के देने की kah kar jo nat jay daan ke dene ki

 

कहकर जो नट जाय,

दान के देने की।

फिर खोटी जूण में जाय,

जगह नहीं रहने की।।टेर।।

 

मनख जूण में साथ थे,

दोनों दोस्‍त हर्षाय।

सियार वानर क्‍यू बणे,

दूजी जूण के माय।

दोनों की सुण लो राय,दान के...।।1।।

 

वानर पूछ्यो सियार ने,

पूर्व जनम के माय।

कोन पाप तूने किया,

जो मरगट मुरदा खाया।

थू कह दे मसाणा माय;दान के...।।2।।

 

सियार कहे सुण बान्‍दरा,

मैं कीदो मोटो पाप।

ब्राह्मण ने देबा की कहकर,

नटग्‍यो बिलकुल साफ।

ज्‍यू सियार बण्‍यो में आय;दान के...।।3।।

 

सियार बन्‍दर ने पूछ लियो,

पाप कर्म की बात।

किस कारण बन्‍दर बणा,

डाल डाल पर जात।

दोड्यो फरे दिन रात,दान के...।।4।।

 

ब्राह्मण का फल चोर कर,

खा जाता दिन रात।

इस कारण बन्‍दर बणा,

सुणले मारी बात।

कहे भैरूदास बतलाय,दान के।।5।।


तर्ज- चेला झूठो कुटम्‍ब परिवार

भाया सोच लो समझ लो बात रेखा करमा की bhaya soch lo samaj lo baat rekha karma ki

 

भाया सोच लो समझ लो बात,

रेखा करमा की।

मत दीज्‍यो किसी ने दोष,

मानो धरमा की।।टेर।।

 

बूढ़ी ब्राह्मणी गोतमी,

रहे धर्म के माय

एकाएक बेटा ने,

सांप जाकर खाय

बेटो मर जावे तत्‍काल, रेखा...।।1।।

 

व्‍याघ्र अर्जुन का आविया,

पकड़ लीना सांप।

तू कहे तो गोतमी,

कर लू काम तमाम।

बदलो लां हाथो हाथ,रेखा...।।2।।

 

बेटा तो नहीं जी सके,

जो थू मारे सांप।

जिन्‍दा इसको छोड़ दे,

नहीं कमावे पाप।

मारा बेटा को आग्‍यो काल,रेखा...।।3।।

 

सांप कहे सुण बावला,

मने दोष मत देय।

पराधीन हू मौत के,

मौत कहे सो होय।

अब सुणलो मौत की बात,रेखा...।।4।।

 

मौत कहे सुण सर्प थू,

हम दोनू दोषी नाय।

काल कहे सो कर रिया,

काल पुत्र को खाय।

सब टाल रिया रे बात,रेखा...।।5।।

 

अब मौत कहे सुणज्‍यो सभी,

दु:ख सुख कोई न देय।

जैसा काम करोगे भाया,

वैसा ही फल होय।

भैरूदास कहे समझाय,रेखा..।।6।।


तर्ज- चेला झूठो कुटम्‍ब परिवार

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