मैं तो मस्ती नाम का भाई,
लाग रही लहर है।
लाग रही लहर भाया,
लाग रही लहर है।।टेर।।
देव दूरा कोयने,
थारे मायला में हेर है।
बाहर भीतर एक है,
कई न दीखे फेर है।।1।।
देव प्रकट देख भाई,
ज्ञान कूंची फेर है।
गुरू बचनां में लाग रिया,
धूल बचन जहर है।।2।।
भूल्यां ने गणां सांसा भाई,
घट में घोर अंधेर है।
अन्त माये जाय एकलो,
ले लां जमड़ा घेर है।।3।।
अन्त आया जावसी,
लागे नाही देर है।
धरा असमान जावे,
रहे न घड़ी पहर है।।4।।
बंशी बाजे सोहन साजे,
गाजे गगन घेर है।
दुर्गा अर्ज करे गरूदेव ने,
आप कीदी महर है।।5।।
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