राजा नल की कथा बतावे,
ज्ञानी संत सुजान॥टेर॥
निशध देश में वीरसेन के,
पुत्र हुए एक ज्ञानी।
नल राजा था नाम जिनका,
शूरवीर और दानी।
साथे अक्षोहिणी सेना रहावे॥1॥
उन्ही दिनों में विदर्भ
देश में,
भीमसेन थे राजा।
संतान इनके थी नहीं,
सो दु:खी रहे महाराजा।
एक दिन दमन ऋषि घर आवे॥2॥
वर दीना जब दमन ऋषि ने,
पुत्र हुए हैं तीन।
दम दान्त और दमन नाम है,
गुणी और प्रवीण।
एक कन्या जनम घर पावे॥3॥
दमयन्ती है नाम कन्या का,
रूप तेज की खान।
सौ सौ दासी दास साथ में,
रखे कन्या का ध्यान।
अब युवावस्था आवे॥4॥
नल दमयन्ती दोनों सुन्दर,
इस धरती पर भाई।
एक दूसरे के गुण सुणके,
दिल में प्रीत जगाई।
दिन दिन विरह सतावे॥5॥
एक दिन नल गये बाग में,
देखा हंस का टोला।
एक हंस को पकड़ लिया जद,
हंस ऐसे बोला।
थाको प्यार गणो मन भावे॥6॥
जाकर कहदू दमयन्ती से,
थाका मन की बात।
थाका से ही शादी करसी,
नहीं किसी के साथ।
तब हंस विदर्भ में जावे॥7॥
दमयन्ती को देख सखी संग,
हंस पास में जावे।
पकड़ण लागी दमयन्ती तो,
हंस यूं बतलावे।
अब नल के रूप बतावे॥8॥
नल के संग में शादी करलो,
मानो बात हमारी।
नल जैसा कोई पुरूष नहीं,
और तेरे जैसी नारी।
नल मेरे मन भावे॥9॥
दमयन्ती अब ऐसे बोली,
जाकर नल से कहणा।
मारा दिल में जच गई प्यारा,
तेरे साथ में रहणा।
फिर नल को जाय बतावे॥10॥
बेटी मोटी देख भीम ने,
स्वयंवर रचवाया।
देश देश के राजाओं को,
निमंत्रण भिजवाया।
बड़े भूपगण आवे॥11॥
उसी समय नारद और पर्वत,
इन्दर लोक सिधाये।
बोले इन्दर राजा,
महाराजा स्वर्ग लोक नहीं
आये।
सब स्वयंवर में जावे॥12॥
इन्दर अगनी वरूण यम तो,
मन में मता बणावे।
स्वयंवर में चालो भाया,
दमयन्ती को ले आवे।
नल रस्ते मिल जावे॥13॥
नल राजा से कहे देवता,
सुण लो बात हमारी।
दूत बनकर जाओ महल में,
सकल न देखे थारी।
नल महलां माही जावे॥14॥
दमयन्ती को कह सुणाया,
देवों का फरमान।
आपको ही दिल से,
पति लिया है मान।
दूजा और कोई नहीं भावे॥15॥
दूत बणकर आया हूं,
झूठ कपट नहीं राखूं।
चारों में से किसी एक को,
पति कहकर राखो।
नल देवों की बतलावे॥16॥
सगाई करबा भेजे कुंवारा ने,
खुद ही की कर आवे।
थाको माको काम एक है,
आप आप की गावे।
कोई माने नहीं मनावे॥17॥
आप और इन्दर सभी देवता,
रंग मण्डप में आवो।
सबके सामने वरण करूंगी,
मन में मत घबरावो।
आकर देवा ने बतलावे॥18॥
दमयन्ती का स्वयंवर में,
आये भूप हजारो।
हाथी घोड़ा रथ ले आये,
बड़े बड़े सरदारों।
सब कुल और नाम बतावे॥19॥
वरमाला ले दमयन्ती,
सब को देखती जावे।
नल जैसे थे पांचों ही राजा,
जिन्हें देख रूक जावे।
कोई भेद समझ नहीं पावे॥20॥
हाथ जोड़कर कहे देवा ने,
नल का भेद बतावो।
नल को ही मैं वरण करूंगी,
मुझे मती भरमावो।
फिर देव लक्षण प्रकटावे॥21॥
पसीना अंग में नहीं होता,
पलके भी नहीं गिरती।
माला भी कुमलाती नाही,
रज ऊपर नहीं पड़ती।
वांके छाया नहीं लखावे॥22॥
सिंहासन पर बैठे हैं,
और पैर जमीन से ऊंचे।
पांचा मायू एक पुरूष के,
उल्टे लक्षण समूचे।
ऐसे भेद समझ में आवे॥23॥
राजा नल को पहचाना और,
वरमाला दी डाल।
हाहाकार मची राजा में,
व्यर्थ फुलाते गाल।
सभी अपने नगर को जावे॥24॥
ऋषि महर्षि व देवी देवता,
देवे साधूवाद।
मनख जनम की मोज्या माणो,
सदा रहो आबाद।
सब नीति धर्म बतावे॥25॥
नल राजा को लोकपालों ने,
आठ दिये वरदान।
यज्ञ में प्रत्यक्ष दर्शन
दूंगा,
अन्त करू कल्याण।
इन्द्र ने यह वरदान बताये॥26॥
जहां पर तुम चाहो वही पर,
प्रकट मैं हो जाऊ।
मेरे जैसे महान तेजस्वी,
लोक तुझे दिलाऊ।
यू अग्नि देव फरमावे॥27॥
तेरे हाथ से बणे रसोई,
रस और स्वाद बढ़ाऊ।
धर्म ध्यान में बुद्धि
रहवे,
ऐसी युक्ति बताऊ।
ऐसे यमराज वर देवे॥28॥
पाणी
की जब इच्छा होवे,
तुरत
प्रकट हो जाऊ।
फूलों
की माला के माही,
हरदम
सुगन्ध रहाऊ।
नल
ने जल देव वर देवे॥॥29॥
नल
राजा को वर देकर के,
देवत
स्वर्ग पधारे।
स्वयंवर
में आये राजा,
अपने
देश पधारे।
भीम
अब विधि से ब्याव करावे॥30॥
कुछ
दिन रहे नल ससुराल में,
फिर
आज्ञा ले जावे।
नित
नया प्रेम होवे दोनों में,
और
प्रजा को पाले।
यज्ञ
करे और करवावे॥31॥
इन्द्रसेन एक लड़का जन्मा,
लड़की इन्द्रसेना।
कम सन्तान और सुखी इन्सान,
और फिर क्या कहना।
सुख से समय बितावे॥32॥
देख स्वयंवर देवता,
स्वर्ग लोक में जावे।
कलयुग ओरी द्वापर दोनों,
सामां आ मिल जावे।
इन्द्र कहे कहां जावो॥33॥
हम जाते है दमयन्ती से,
ब्याव रचाने भाई।
स्वयंवर तो हो गया,
तुम्हें नीन्द क्यूं आई।
वा तो नल संग राच रचावे॥34॥
तुम दोनों को छोड़कर के,
नल संग ब्याव रचाया।
नल और दमयन्ती दोनों का,
बुरा समय अब आया।
ऐसे कलयुग कह डरपावो॥35॥
कलयुग ने जा डेरा दीना,
निषध देश के मांही।
राजा नल की कमी देखतो,
रहवे हरदम भाई।
ऐसे बारह बरस बितावे॥36॥
बारह बरस के बाद मायने,
एक दिन ऐसा चूका।
लघुशंका कर हाथ मुंह धोये,
पैर राख दिये सूखा।
जल से कुरला भी कर लेवे॥37॥
बिना पैर धोये ही राजा,
संध्या करने लाग्या।
कलयुग ने झट मौका देखा,
नल के तन में आग्या।
अब नल को बहुत सतावे॥38॥
धर कलयुग ने रूप दूसरा,
कपटी कपट रचाया।
नल का छोटा भाई पुष्कर,
उसके पास में आया।
नल से जुआ खेलण को कहवे॥39॥
थारे साथ में रह करके,
मैं जीत करादू थारी।
राजपाट सारा ही जीतो,
जीतो माया सारी।
पुष्कर नल के पास में आवे॥40॥
पुष्कर के कहने से नल ने,
जुआ खेल रचाया।
हाथी घोड़ा रथ और सोना,
सब का दांव लगाया।
नल सभी हारता जावे॥41॥
महीना बीत गये ऐसे ही,
नहीं किसी की माने।
दमयन्ती भी कह कह हारी,
लगी बहुत घबराने।
प्रजा ज्यूं आवे ज्यूं
जावे॥42॥
दमयन्ती ने जब यह देखा,
राजा हारते जाते हैं।
सारथी के साथ पुत्रों को,
ननिहाल भिजवातें हैं।
सारथी अयोध्या रह जावे॥43॥
ऋतुपर्ण राजा का सारथी,
वार्षणेय बण जावे।
देख बुरा दिन सारथी,
अपना गुजर चलावे।
विधना कैसे खेल खिलावे॥44॥
राजपाट सब हार गये,
रखा कुछ भी न बाकी।
तन के कपड़े तक ही हारे,
एक लंगोटी राखी।
ऐसी कलयुग कला बतावे॥45॥
नल राजा को पुष्कर कहवे,
सुण ले मेरी बात।
दमयन्ती को लगा दांव पर,
और नहीं कुछ पास।
राजा कुछ भी बोल न पावे॥46॥
राजपाट तज नल दमयन्ती,
बन में हुए रवाना।
तीन रात तक रहे गोरमे,
कोई न खिलावे खाना।
देखो कैसी आफत आवे॥47॥
पुष्कर ने ऐसी डूंडी
पिटवादी,
सुण लो जनता सारी।
जो कोई सहाय करेगा इनकी,
डण्ड दुंगा मैं भारी।
सजा मृत्युदण्ड बतावे॥48॥
नल दमयन्ती वहां से चाले,
कोई नहीं है साथे।
बहुत दिनों तक रहे भटकते,
कंद मूल फल खाते।
कभी भूखे ही रह जावे॥49॥
एक दिन कुछ पक्षी देखे,
पांख सोना के जैसे।
इनका मैं आहार करूंगा,
पंख से मिलेंगे पैसे।
अपना कपड़ा उन्हे ओढ़ावे॥50॥
धोती लेकर उड़ गये पक्षी,
लावे और कहां से।
उड़ते पक्षी ऐसे बोले,
हम कलयुग के पासे।
तु कपड़े पहन क्यूं आये॥51॥
नग्न अवस्था में अब राजा,
भूखा प्यासा डोले।
मेरे साथ तुम दु:ख मत देखो,
राणी से यू बोले।
रस्ता पीहर का बतलावे॥52॥
दु:ख में कैसे साथ छोड़ दूं,
प्राणपति हो मेरे।
साथ-साथ जीने मरने के लिए,
आपसे लिए फेरे।
मेरे प्राण निकल नहीं जावे॥53॥
मारे पीहर चलो पियाजी,
मिल जावेगो सहारो।
ऐसी दशा में कैसे चालू,
मान घटे है मारो।
मासे अब तो चल्यो नहीं
जावे॥54॥
भूखे प्यासे पहुंचे दोनों,
धर्मशाला के माही।
एक ही कपड़ा पहन रखा है,
जैसे गोथ लगाई।
दोनों मिट्टी में सो जावे॥55॥
थोड़ी देर में जागे राजा,
नीन्द कठा से आवे।
इसे छोड़कर जाऊ यहां से,
मेरे साथ दु:ख पावे।
फिर पीहर चली ये जावे॥56॥
एक कपड़ा फाड़कर के,
दो टुकड़ा कर लीना।
सूती राणी छोड़ चला,
जब पत्थर कीना सीना।
थोड़ा जाकर पाछा आवे॥57॥
फूट फूट कर राजा रोवे,
कुछ भी कहा न जाय।
महलों में सोने वाली की,
दशा न देखी जाय।
छाती भर-भर उनकी आवे॥58॥
कलयुग ने जब जोर लगाया,
गाठी कीदी छाती।
बन में एकेली छोड़ चला,
रहा न कोई साथी।
राणी सूती रह जावे॥59॥
नीन्द खुली जब दमयन्ती की,
रही एकेली बन में।
मुझे छोड़कर कहां गये स्वामी,
क्या सोची है मन में।
मेरा क्या अपराध बतावे॥60॥
बिलखी बिलखी फिरे जंगल में,
आवाज देवे राजा को।
भूखी प्यासी रूदन करे और,
सोच करे राजा को।
अजगर के पास चली जावे॥61॥
राणी को जब लगा निगलने,
राणी बहुत चिल्लावे।
रूदन सुणकर राणी का,
व्याध एक आ जावे।
अजगर को मार छुड़ावे॥62॥
अजगर ग्रसित तन को धोकर,
व्याध करे उपकार।
भोजन की व्यवस्था कर दीनी,
मन में और विचार।
भोजन दमयन्ती कर पावे॥63॥
भोजन कर बेठी दमयन्ती,
व्याध ने यूं बतलावे।
रूपवान तुम अति सुन्दर हो,
जंगल में कहां जावे।
क्यूं नहीं मेरे पास रह
जावे॥64॥
मन बगड़ता देख व्याध का,
राणी मन में सोचे।
पतिव्रता मैं होऊ तो,
जीव राम भरोसे।
मारो धरम ही लाज रखावे॥65॥
श्राप दिया जब दमयन्ती ने,
व्याध तुरत जल जावे।
पतिव्रता नारी को भाई,
ऐसे ही धर्म बचावे।
फिर रोती जंगल में जावे॥66॥
नल राजा को फिरे हेरती,
पता कही ना पावे।
तीन दिनों तक फिरत फिरते,
एक आश्रम पर आवे।
आश्रम देख जीव सुख पावे॥67॥
आश्रमवासी देकर ढाढ़स,
अन्तर्ध्यान हो जावे।
राज मिलेगा राणी तुमको,
क्यूं मन में घबरावे।
ऐसा कहकर सब गुम जावे॥68॥
फिरते फिरते जंगल में,
एक व्यापारी दल देखा।
हाथी घोड़े ऊंट साथ में,
धन माल अनोखा।
उनके साथ राणी हो जावे॥69॥
जाय सरोवर तीर पास में,
डेरा रात को दीना।
जंगली हाथी आये जंगल से,
तहस-नहस कर दीना।
कई मरे कई भग जावे॥70॥
मरने से जो बचे व्यापारी,
उनके साथ में जावे।
चेदी राज सुबाहु की,
रजधानी में आवे।
पागल ज्यूं भटकावे॥71॥
आधी साड़ी ओड़ नगर में,
हरती फरती जावे।
महलों के जब आई सामने,
राणी अन्दर बुलावे।
जाति सेरन्द्री बतलावे॥72॥
सेरन्द्री तुम रहो यहीं पर,
तेरा पति ढ़ंढवाऊ।
बात करू नहीं पर पुरूष से,
नहीं झूठा खाऊं।
मेरे से पैर कोई न धुलावे॥73॥
कोई मुझको पाना चाहे,
मृत्युदण्ड उनको देना।
इतनी व्यवस्था हो सके तो,
होवे मेरा रहना।
तब दमयन्ती रह जावे॥74॥
दमयन्ती को छोड़ के राजा,
गहन जंगल में आवे।
जंगल जलता देखा नल ने,
भीतर वाज लगावे।
कोई जलता मुझे बचावे॥75॥
कर्कोटक जल रहा आग में,
बार बार चिल्लावे।
नल राजा जल्दी से आवो,
आकर मुझे बचावे।
मुझसे दौड़ चला नहीं जावे॥76॥
नारद को मैंने डरपाया,
तब उसने दे दिया श्राप।
नल राजा जब आवेंगे,
तभी मिटे सन्ताप।
मेरा श्राप आज मिट जावे॥77॥
मुझे काढ़कर बाहर निकालो,
करूंगा कल्याण।
अंगूठे जैसा छोटा हो गया,
हल्का मुझको मान।
अग्नि से बाहर ले जावे॥78॥
बाहर लाकर छोड़ण लागा,
कर्कोटक यूं बोला।
गणता जावो पावंडा,
फिर भेद तुम समझोला।
नल एक से गणतो जावे॥79॥
दस जैसे ही बोला राजा,
कर्कोटक डस लीना।
असली रूप बदल कर नल का,
श्याम वरण कर दीना।
अब तो कोई पहचान नहीं पावे॥80॥
जब तक कलयुग रहेगा तन में,
दु:ख पावेगा भारी।
जहर चढ़ेगा कलजुग को और,
मिटेगी आफत सारी।
कोई जन्तु नहीं सतावे॥81॥
श्राप शत्रु का डर नहीं
रहवे,
जहर नहीं चढ़ पावे।
युद्ध में होगी जीत हमेशा,
तुरत राज मिल जावे।
सुतदारा भी मिल जावे॥82॥
पहले जैसा रूप चाहो तो,
मुझे याद कर लेना।
मैं जो कपड़ा देऊ उसको,
तन पे ओढ़ तुम लेना।
फिर वही रूप बण जावे॥83॥
राजा अयोध्या ऋतुपर्ण के,
पास चले तुम जावो।
अश्व विद्या उन्हें सिखाकर,
द्युत विद्या ले आवो।
फिर पुन: राज मिल जावे॥84॥
बाहुक नाम अपना बतलाणा,
सारथी बण जाणा।
इतना कहकर कर्कोटक ने,
अपना समय पछाणा।
तब अन्तर्ध्यान हो जावे॥85॥
ऋतुपर्ण की नगरी में,
दस दिन में जा पहुंचा।
बाहुक नाम है घोड़ा पढ़ाऊ,
कोई न मेरे से ऊंचा।
चाहे भोजन भी बणवाले॥86॥
कारीघरी का काम भी जाणू,
जो चाहो करवालो।
गरीबी के कारण दु:खी हूं,
घर नौकर रखवालो।
नल राजा अर्ज सुणावे॥87॥
मेरी इच्छा ये है बाहुक,
घोड़ा ऐसे भागे।
जल्दी पहुंच जाऊ कहीं भी,
रहवूं सबसे आगे।
बाहुक हामल भरतो जावे॥88॥
आज तुम घोड़ा अध्यक्ष,
सेवा तेरी लूंगा।
साल की दस हजार मोहरे,
तनखा तुझको दूंगा।
बाहुक वहीं रहने लग जावे॥89॥
याद करे राजा राणी को,
राणी की गति वो ही।
न्यारा न्यारा रहे राज
में,
पता लगाये दो ही।
राणी पीहर में चली जावे॥90॥
पीहर में अब रचा स्वयंवर,
नल होगा तो आवेगा।
भाग भरोसे कब तक बैठूं,
लिखा होय मिल जावेगा।
सबके समाचार भिजवावे॥91॥
ब्राह्मण भेजकर दमयन्ती ने,
पता लगाया भाई।
ऋतुपर्ण राजा के यहां पर,
नल की बात बताई।
अब कला एक बतलावे॥92॥
खबर पहूंचाई ऋतुपर्ण के,
स्वयंवर कल होगा।
आ सको तो आ जावो,
फिर न मिलेगा मौका।
राजा बाहुक को बतलावे॥93॥
ऐसे घोड़े जोवो रथ में,
पहुंच जाये एक दिन में।
बाहुक ने रथ त्यार किया,
और हुआ रवाना छिन में।
रथ पवन वेग से जावे॥94॥
चादर पड़ गई राजा की तो,
राजा ऐसे कहवे।
थोड़ी देर रथ को रोको,
चादर वापस लावे।
पीछे चार कोस रह जावे॥95॥
बहड़े का एक आया वृक्ष तब,
ऋतुपर्ण यूं बोला।
पांच करोड़ तो पत्ते इसके,
फल का भेद अब खोला।
दो हजार पचानवे बतावे॥96॥
वृक्ष काटकर गणती कीदी,
पूरा का पूरा पाया।
अश्व विद्या दी बाहुक ने,
व राजा ने द्युत बतलाया।
दोनों समझे और समझावे॥97॥
द्युत विद्या का रहस्य
जानते,
कलजुग बाहर आया।
श्राप दूंगा तुझको अब मैं,
तूने नाश कराया।
कलयुग हाथ जोड़ फरमावे॥98॥
श्राप मती दो शरण आपकी,
नाम आपका रहेगा।
कथा कीरतन करे आपकी,
कलयुग नहीं लगेगा।
तब राजा रूक जावे॥99॥
बहड़े में जा छुप गया कलयुग,
देख कोई ना पावे।
नल ही देख सका यह लीला,
आपस में बतलावे।
तब से बहड़ा बुरा बतावे॥100॥
कुन्दनपुर में पहूंचे राजा,
शाम होते होते।
दासी जावो पता लगावो,
बोली रोते-रोते।
ऐसे दमयन्ती समझावे॥101॥
जाकर दासी वापस आई,
आकर वापस जावे।
बाहुक भी परदे में रहकर,
सारी बात बतावे।
थोड़ा थोड़ा भरोसा आवे॥102॥
बिन अगनी के आग लगावे,
खाली घड़ा भर जावे।
दरवाजे में झुकता नाही,
दरवाजा बढ़ जावे।
ऐसा दासी आय बतावे॥103॥
लड़को को लेकर गई दासी,
देख के बाहुक रोवे।
मेरे भी ऐसे ही लड़के,
कहां है कौन बतावे।
दासी महल में फिर आवे॥104॥
मात पिता की आज्ञा ले,
बाहुक को महल बुलाया।
आपस में सब बातें पूछी,
पूरा भरोसा आया।
दोनों राे-रो दु:ख सुणावे॥105॥
बाहुक बोला स्वयंवर का,
कैसा ढोंग रचाया।
और बात तो आई समझ में,
यह समझ नहीं पाया।
तब दमयन्ती बतलावे॥106॥
एक दिन के कोस चार सौ,
कौण चल के आवे।
नल होंगे यदि सारथी तो,
जरूर यहां आ जावे।
आप आये भरोसा आवे॥107॥
आकाशवाणी ऐसे बोली,
हम देते है शाखा।
दमयन्ती में दोष नहीं है,
भला करेगी थांका।
गगन से देवता फरमावे॥108॥
कर्कोटक का ओढ़ा कपड़ा,
असली रूप में आया।
तीन साल से हुआ है मिलना,
दु:ख ही दु:ख भुगताया।
जाणकर सभी दु:खी हो जावे॥109॥
नल दमयन्ती की कथा प्रेम
से,
जो कोई सुणते भाई।
उनके ऊपर कलयुग की,
पड़े नहीं परछाई।
शाखा से भैरूलाल बतावे॥110॥
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